पटना: प्रशांत किशोर जदयू पार्टी में ऊंचा ओहदा रखते हैं। चुनावी रणनीतिकार के बाद वे दलीय राजनीति में स्थापित होने के इरादे से बिहार में जदयू से जुड़े। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तवज्जो के बावजूद वो राजनीति में खुद को सहज नहीं महसूस कर रहे हैं। लिहाजा एक बार फिर वे चुनावी रणनीतिकार की भूमिका में आना चाहते हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उनकी हालिया डील चर्चा में है।

जानकारों की मानें तो स्थापित नेता होना और चुनावी रणनीतिकार की भूमिका में बड़ा अंतर है। प्रशांत किशोर दोनों नावों पर सवार होकर अपना करियर आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं। सामान्य तौर पर ऐसा कर पाना किसी भी शख्स के लिए संभव नहीं है। लिहाजा प्रशांत किशोर फिर अपनी मूल भूमिका में आ गए हैं। प्रशांत किशोर को नेतागिरी में स्थापित हो पाने का कोई अफसोस नहीं है। उन्हें पता है कि उनकी शख्सियत को अब बड़े बड़े नेता तवज्जो देने लगे हैं।

ममता बनर्जी से हुई प्रशांत किशोर की डील, आंध्र में जबरदस्त सफलता के बाद अगला टारगेट प.बंगाल

YS जगन मोहन रेड्डी के साथ प्रशांत किशोर: फाइल फोटो
YS जगन मोहन रेड्डी के साथ प्रशांत किशोर: फाइल फोटो

आंध्र प्रदेश के बाद प. बंगाल का रुख

दक्षिण भारत के राज्य आंध्र प्रदेश में YSRCP को सत्ता दिलाकर प्रशांत किशोर खूब वाहवाही लूट रहे हैं। इसके बाद तो कई पार्टियां उन्हें सत्ता की कुंजी मानने लगी है। बीजेपी से हैरान परेशान ममता दीदी को किसी ने सुझाया कि वे प्रशांत किशोर से मिलें। पहली मुलाकात में ही डील फाइनल बताई जाती है।

कौन हैं प्रशांत किशोर?

प्रशांत किशोर बिहार के बक्सर के रहने वाले हैं। मध्यम वर्ग से आने वाले प्रशांत किशोर के बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था कि वे इतना नाम कमा सकेंगे। शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। फिर इंजीनियरिंग करने हैदराबाद चले आए। किशोर के पिता डॉ. श्रीकांत पांडेय बक्सर के जिला अस्पताल में मेडिकल सुपरिन्टेंडेंट थे। इलाके में उनकी खासी इज्जत और रुतबा था। लिहाजा सेवानिवृत्त होने के बाद बक्सर में ही प्रैक्टिस करने लगे। कुछ दिनों पहले ही उनके निधन के बाद प्रशांत किशोर ने बक्सर आना जाना कम कर दिया है। ज्यादातर उनका वक्त पटना और बिहार से बाहर ही गुजरता है।

प्रशांत किशोर
प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर के बाकी परिवार की बात करें तो बड़े भाई अजय किशोर का दिल्ली में ठिकाना है। दोनों बहनों की शादी हो चुकी है। एक बहनोई सेना में बड़े अधिकारी हैँ।

आम युवा की ही तरह इंजीनियरिंग करने के बाद प्रशांत किशोर को बेहतर करियर की तलाश थी। पहली नौकरी यूनिसेफ में मिली, इस दौरान सीखने का काफी मौका मिला। यहां प्रशांत किशोर को विभिन्न मुद्दों की ग्लोबल ब्रांडिंग का काम सौंपा गया। यहीं उन्होंने वो हुनर सीखा, जिसके दम पर आज वे खूब नाम कमा रहे हैं।

2011 में भारत पहुंचने के बाद वे नरेंद्र मोदी के कैम्पेन 'वाइब्रेंट गुजरात' से जुड़े। इसी दौरान तत्कालीन गुजरात के मुखिया नरेंद्र भाई मोदी ने उनके हुनर को परखा और 2014 लोकसभा चुनाव के कैम्पेनिंग की बड़ी जिम्मेदारी दे दी। 2014 के चुनाव में प्रशांत किशोर ने प्रोफेशनल एप्रोच अपनाया। डिजिटल माध्यम से पहली बार बड़े पैमाने पर बीजेपी की ब्रांडिंग की।

नरेंद्र मोदी के साथ प्रशांत किशोर: फाइल फोटो
नरेंद्र मोदी के साथ प्रशांत किशोर: फाइल फोटो

प्रशांत किशोर की संस्था सिटिजंस फॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस (कैग) अब तक स्थापित हो चुकी थी। प्रशांत किशोर ने अपनी संस्था को फिर से गठित करके इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी नाम दिया है। यह संस्था अमेरिकी तंत्र से बहुत हद तक प्रभावित है। जिसमें फिलहाल कई पेशेवर लोगों को जोड़ा गया है। साथ ही आधुनिक तौर तरीकों के साथ विश्लेषण का काम किया जाता है। प्रशांत किशोर ब्रांडिंग के लिए नए तौर तरीके भी ईजाद करते हैं।

कहते हैं 2015 में नीतीश कुमार से उनकी पहली मुलाकात अरुण जेटली के घर में हुई थी। सीएम नीतीश उनके बारे में पहले ही काफी कुछ सुन चुके थे। लिहाजा साथ देने का प्रस्ताव दिया तो पीके तुरंत मान गए। दरअसल 2014 में बीजेपी के लिए कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें वो क्रेडिट नहीं मिल सका था जिसके वे हकदार थे। इस कारण वे बीजेपी से चिढ़े हुए भी थे। बिहार में 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी के खिलाफ जबरदस्त घेराबंदी की कि पीएम मोदी भी चकित रह गए।

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प्रशांत किशोर मुख्यमंत्री नीतीश व अन्य नेताओं के साथ 
प्रशांत किशोर मुख्यमंत्री नीतीश व अन्य नेताओं के साथ 

2017 में फेल हुई थी प्रशांत किशोर की रणनीति

2017 का साल प्रशांत किशोर के लिए अच्छा नहीं रहा। यूपी में कांग्रेस की चुनावी रणनीति तैयार करने की उन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई थी। प्रशांत किशोर सीधे तौर पर राहुल गांधी को रिपोर्ट कर रहे थे। माना जाता है कि इससे यूपी कांग्रेस के बड़े नेता प्रशांत से चिढ़े हुए थे। प्रशांत किशोर भी दबे सुर में आरोप लगा चुके हैं कि तब उनकी बात यूपी कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेता नहीं मान रहे थे।

फिर बाद में प्रशांत किशोर ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को जिता कर कांग्रेस की भी साख बचाई। प्रशांत किशोर अब पश्चिम बंगाल की राजनीति का अध्ययन कर रहे हैं। उनके पास पूरा वक्त है, ममता दीदी के साथ बेहतर तालमेल हुई तो इस बार भी वे करिश्मा कर सकते हैं।