नई दिल्ली : लोकसभा चुनाव के दौरान वैसे तो सभी राजनीतिक दल और उनके प्रत्याशियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी होती है। इन सबसे अलग कई ऐसे राजघराने हैं, जो सदियों से राजनीति में सक्रिय हैं और अहम भूमिका निभा रहे हैं। आइए जानते हैं इस लोकसभा चुनाव में कौन-कौन से ऐसे राजघराने हैं, जिनकी चुनावी प्रतिष्ठा दांव पर है।

ग्वालियर रियासत (मध्य प्रदेश)

राजनीति में सिंधिया राजघराने का पुराना इतिहास रहा है। इस घराने की राजनीतिक एंट्री 1957 में महारानी विजय राजे सिंधिया के कांग्रेस के टिकट पर गुना से चुनाव लड़ने से हुई। उनके बेटे माधवराव सिंधिया कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और 9 बार सांसद बने। इस वक्त माधवराव के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से सांसद हैं।

राघोगढ़ (मध्य प्रदेश)

मध्य प्रदेश के राघोगढ़ राजघराने के राजा बलभद्र सिंह ने 1951 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ा। इसके बाद उनके बेटे और मौजूदा कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस समय दिग्विजिय सिंह भोपाल से कांग्रेस के लोकसभा में उम्मीदवार हैं। दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह राघोगढ़ से विधायक हैं।

धौलपुर राजघराना (राजस्थान)

महारानी विजयराजे संधिया की बेटी वसुंधरा राजे का विवाह धौलपुर रियासत की महाराजा राणा हेमंत सिंह से हुआ था, जो कि बाद में उनसे अलग हो गईं। साल 1984 में वह भाजपा से जुड़ी और दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं। उनके बेटे दुष्यंत सिंह इस वक्त झालावाड़ से सांसद हैं और 2019 के चुनाव में भी यहीं से चुनाव लड़ा।

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अमेठी राजघराना (यूपी)

अमेठी राजघराना हमेशा से कांग्रेस के साथ जुड़ा रहा है। राजा संजय सिंह ने 1980 में राजनीतिक पारी की शुरुआत की और दो बार विधायक रहे। 1998 में राजा संजय सिंह अमेठी से ही बीजेपी के टिकट पर सांसद बने। संजय सिंह 2003 में कांग्रेस में वापस लौटे और 2009 में सुल्तानपुर से सांसद बने। इस वक्त सुल्तानपुर लोकसभा से वह वरुण गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं।