नई दिल्ली : डॉक्टरी छोड़ पत्रकार बने कर्नाटक के यू पी शिवनंदा को राजनीति के दिग्गजों के सामने मैदान में उतरने का अलग सा शौक है। शिवनंदा इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने मैदान में हैं लेकिन वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने लड़ने की उनकी इच्छा अधूरी ही रह गई क्योंकि वहां से उनका नामांकन खारिज कर दिया गया है।

मेडिसिन में स्नातक शिवनंदा ने स्थानीय कन्नड़ दैनिक समाचार पत्र चलाने के लिए चिकित्सक पेशा छोड़ दिया था। वह इस समाचार पत्र के जरिए दक्षिणी कन्नड़ के पुत्तूर जिले के स्थानीय मुद्दों को रेखांकित करते हैं।

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शिवनंदा का कहना है कि जीत या हार उनके लिए मायने नहीं रखती क्योंकि चुनाव में दावेदारी पेश करना उनका शौक है।

शिवनंदा ने कहा, ‘‘ मैं लोकतंत्र प्रणाली में अपना योगदान देना चाहता हूं ना केवल वोट देकर बल्कि अपनी उम्मीदवारी पेश करके भी। यह मेरा एक शौक है। जब भी में प्रचार के लिए जाता हूं तो मैं यहीं कहता हूं कि मैं यहां वोट मांगने नहीं आया हूं बल्कि एक संदेश देने आया हूं।''

उन्होंने कहा, ‘‘ मैंने अमेठी में राहुल गांधी और वाराणसी से नरेन्द्र मोदी को टक्कर देने के लिए वहां से नामांकन भरा था, क्योंकि लोकसभा की लड़ाई सिर्फ दो पक्षों के बीच सीमित हो गई थी। मैं अमेठी से मैदान में हूं लेकिन दस्तावेजों की कमी का हवाला देते हुए वाराणसी से मेरा नामांकन रद्द कर दिया गया। अगर दस्तावेज अमेठी के लिए पर्याप्त हैं तो वाराणसी के लिए क्यों नहीं?''

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शिवनंदा ने इस मामले पर भारत निर्वाचन आयोग से इसकी शिकायत भी की है। ऐसा पहली बार नहीं है जब शिवनंदा बड़े नामों के सामने अपनी उम्मीदवारी पेश कर रहे हैं।

इससे पहले उन्होंने 1985 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव भी लड़ा था। उन्होंने उन चार विधानसभा क्षेत्रों से नामांकन भरा था जहां से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार मैदान में थे।

शिवनंदा ने 2009 में भाजपा के दो बार के सांसद नलिन कुमार कतील के सामने भी कर्नाटक की दक्षिणी कन्नड़ सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा था।