नई दिल्ली: आजम खान की जया प्रदा के खिलाफ गुस्ताखी जगजाहिर है। उन्होंने जया प्रदा के अंत:वस्त्र को लेकर टिप्पणी की थी। जिसको लेकर चुनाव आयोग ने संज्ञान लिया और आजम की कुछ दिनों के लिए बोलती बंद करा दी गई। सवाल उठता है कि क्या आगे भी आजम चुप रहेंगे? इसकी कम ही गुंजाइश लगती है। बिना नाम लिए आजम फिर हमले करेंगे, ऐसे कयास भी लगाए जा रहे हैं। आम लोगों के जेहन में ये सवाल जरूर है कि आजम आखिर जया प्रदा से इतना खार क्यों खाए हुए है?

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आजम और जया के बीच अदावत की असली वजह अमर सिंह बताये जाते हैं। पहली बार जब 2004 में जया प्रदा रामपुर चुनाव लड़ने आई थीं तो दोनों नेताओं ने उन्हें हाथों हाथ लिया था। दोनों के बीच जया प्रदा को जिताने की जैसे होड़ मची थी। यूं कहें कि 'एक फूल दो माली' वाली कहावत तब चरितार्थ होती थी। जया 2004 में रामपुर से सपा की सांसद बनीं।

जया प्रदा और आजम खान: फाइल फोटो
जया प्रदा और आजम खान: फाइल फोटो

सफलता के बाद जया ने कई मौकों पर आजम खान को नजरअंदाज किया। साथ ही उनकी सियासी करीबी अमर सिंह के प्रति बढ़ती चली गई। अमर सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जया प्रदा और आजम के बीच कुछ अनचाहा हुआ। जिसकी वजह से दोनों के रिश्तों में तल्खी आई। बकौल अमर सिंह, एक बार जया प्रदा आजम के साथ पर्दा लगी कार में सवार होकर कहीं जा रही थीं। इसी दौरान उनके बीच गरमा गरम बहस हुई। फिर इस घटना के बाद से जया ने आजम खान को अनदेखा करना शुरू कर दिया। हालांकि इस वाकये को लेकर खुद जया प्रदा ने कभी तफ्सील नहीं दी।

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खैर निजी तौर पर जया प्रदा आजम के बारे में जो भी राय रखती हों। 2009 के चुनाव में दोबारा उतरते वक्त उन्होंने सार्वजनिक सभाओं में आजम के लिए भाई शब्द का ही इस्तेमाल किया। जबकि आजम खान ने जया प्रदा को हराने के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखी। चुनाव बाद जया प्रदा ने आजम खान पर कई गंभीर आरोप लगाए। यहां तक कि कहा कि आजम ने उनकी मॉर्फ की हुई न्यूड तस्वीरें इलाके में बंटवाई। बकौल जया आजम के गुर्गों ने उन्हें एसिड अटैक की धमकी भी दी। हालांकि इन आरोपों ने पर आजम ने इतना ही कहा, "मैं नाचने गाने वालियों के मुंह नहीं लगता।" कहा तो ये भी जाता है कि आजम खान की वजह से ही जया को जीत के लिए 2009 में काफी मशक्कत करनी पड़ी और उनका वोट प्रतिशत भी कम हुआ।

2009 लोकसभा के चुनाव के वक्त आजम का सपा में दबदबा अधिक था। लिहाजा उन्होंने उन्होंने तमाम जुगत करके अमर सिंह को पार्टी से निकलवा दिया। अमर की करीबी बन चुकीं जया को भी पार्टी से किनारा किया गया।

अब आजम और जया के बीच की लड़ाई खुल्लम-खुल्ला हो गई थी। बावजूद इसके जया प्रदा की भाषा आजम के लिए संयत ही रही। अमर सिंह भी सार्वजनिक बयानों में जया का उतना साथ नहीं दे पाए। वजह ये थी कि अमर सिंह के पर पूरी तरह कतर दिए गए थे।

जया प्रदा और आजम खान: फाइल फोटो
जया प्रदा और आजम खान: फाइल फोटो

सपा से किनारा करने के बाद जया प्रदा ने रालोद के टिकट पर 2014 में बिजनौर से हाथ आजमाया था। जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। क्षेत्रीय पार्टियों की किट-किट से बचने के लिए जया प्रदा ने इस बार राष्ट्रीय पार्टी का दामन थामा है। अब वे भाजपाई बन चुकी हैं। रामगढ़ में इस बार उन्हें मुस्लिम वोटों की उम्मीद कम ही है। लिहाजा अगर वे आजम के खिलाफ जली कटी कहती भी हैं तो मुस्लिम वोटरों के बिदकने का जया को खतरा नहीं है। उनका इरादा हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी समर्थक हिंदू वोटों को एकजुट करने की है।

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जया प्रदा ने इस बार के चुनाव में साफ कह दिया है कि आजम के साथ उनके सारे रिश्ते खत्म हो चुके हैं। वहीं जया प्रदा सार्वजनिक सभाओं में आजम के खिलाफ टिप्पणी करने से बचती नजर आती है। कुरेदने पर वो भावुक होते हुए कहती हैं कि अब आजम से उनका कोई नाता ही नहीं रहा।

जया प्रदा और आजम खान: फाइल फोटो
जया प्रदा और आजम खान: फाइल फोटो

नेताओं से भिड़ने के बाद पार्टी छोड़ने का जया का इतिहास

जया प्रदा ने 1994 में राजनीतिक करियर शुरू किया था। कहते हैं तेदेपा सुप्रीमो चंद्रबाबू से भी मतभेदों के कारण ही उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी थी। इसके बाद सपा के साथ भी उनका खट्टा मीठा अनुभव रहा। यहां भी सपा के दिग्गज नेता आजम खान से अदावत के चलते जया ने पार्टी को बाय बाय कहा। रालोद में उनकी सक्रियता कम ही देखने को मिली। अब देखना है कि बीजेपी में उनका राजनीतिक भविष्य कैसा रहता है?