नई दिल्ली/लखनऊ : वैसे अगर देखा जाय तो उत्तर प्रदेश की बदायूं लोकसभा सीट यादव परिवार की पारंपरिक सीट बन गयी है। यहां से परिवार के नेता धर्मेंद्र यादव सपा के टिकट पर सांसद है। हालांकि इसके बाद कांग्रेस ने भी इसी सीट से पार्टी के वरिष्ठ नेता सलीम शेरवानी को प्रत्याशी बनाकर लोकसभा चुनाव को दिलचस्प बनाने की तैयारी की है, लेकिन अंदरखाने में यह चर्चा है कि प्रत्याशियों की घोषणा के बाद अखिलेश यादव के रुख को देखकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपना फैसला बदलने की तैयारी कर रहे हैं।

बताया जा रहा है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की नाराजगी का असर कांग्रेस पार्टी में दिखने भी लगा है और कांग्रेस यादव परिवार की खास मानी जाने वाली सीटों पर उम्मीदवार उतारने पर फिर से विचार कर सकती है। इतना ही नहीं, मैनपुरी, कन्नौज, आजमगढ़, इटावा, फर्रुखाबाद जैसी सीटों के साथ साथ मायावती की सीट पर भी उम्मीदवार नहीं उतारने की फिराक में है। ताकि आपस में किसी तरह की खींचतान न हो।

राहुल गांधी एवं अखिलेश यादव (फाइल फोटो)
राहुल गांधी एवं अखिलेश यादव (फाइल फोटो)

पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, अब कांग्रेस एसपी-बीएसपी के पारिवारिक सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतारने को राजी होती दिख रही है और माना जा रहा है कि इस क्रम में सबसे पहले अखिलेश यादव की नाराजगी को कम करने के लिए बदायूं सीट पर घोषित उम्मीदवार को वापस लेने पर विचार कर रही है।

यह दी थी धमकी

कांग्रेस के बदायूं सीट से उम्मीदवार उतारने के बाद अखिलेश यादव ने साफ कर दिया था कि अगर कांग्रेस बदायूं सीट से अपने प्रत्याशी की नाम वापस नहीं लेता है, तो अमेठी और रायबरेली में भी एसपी-बीएसपी गठबंधन अपने उम्मीदवार खड़ा करके कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ा करेगा। अगर ऐसा होता तो ये कांग्रेस के लिए बड़ी मुश्किल हो सकती है, क्योंकि अमेठी और रायबरेली में कभी भी विपक्ष अपने उम्मीदवार नहीं खड़ा करता रहा है।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (फाइल फोटो)
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (फाइल फोटो)

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हालांकि कांग्रेस पार्टी के किसी नेता ने इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की है, पर जिस तरह से संकेत मिल रहे हैं उससे साफ तौर पर जाहिर है कि सपा-बसपा की यह बात कांग्रेस पार्टी को मानना मजबूरी है।

आपको बता दें कि, बदायूं सीट यादव परिवार की पारंपरिक सीट है और धर्मेंद्र यादव बदायूं से 2014 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीतने वाले पांच सांसदों में से एक हैं। परिवार के इस मजबूत सीटको सपा किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती है। इसीलिए सपा इसके लिए जोर लगा रही है।