नयी दिल्ली: वर्तमान लोकसभा के अंतिम सत्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में "सूरज को नहीं डूबने दूंगा'' की पंक्ति वाली एक कविता सुनायी जिसका राजनीतिक विश्लेषक विभिन्न अर्थ निकाल सकते हैं। मोदी ने बृहस्पतिवार को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियों का लेखाजोखा पेश किया तथा विपक्ष के तमाम आरोपों का विस्तार से जवाब दिया।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने हिंदी के मशहूर कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता का अंश पढ़ा। इसका शीर्षक है "सूरज को नहीं डूबने दूंगा।'' उन्होंने कविता के इस अंश को पढ़ा, "सूरज जायेगा भी तो कहां, उसे यहीं रहना होगा। यहीं हमारी सांसों में, हमारी रगों में, हमारे संकल्पों में, हमारे रतजगों में। तुम उदास मत होओ, अब मैं किसी भी सूरज को नहीं डूबने दूंगा।''

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इससे पूर्व चर्चा में लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा अपने संबोधन में कर्नाटक के समाज सुधारक वासवन्ना की एक कविता का जिक्र किया गया था। प्रधानमंत्री मोदी ने उस कविता के कुछ और अंश भी पढ़े। उन्होंने कविता के संवेदनात्मक पहलू का उल्लेख करते हुये कहा "जब कभी झूठ की बस्ती में सच को तड़पते देखा है, तब मैंने अपने अंदर किसी बच्चे को सिसकते देखा है। अपने घर की चार दीवारी में अब लिहाफ में भी सिहरन होती है, जिस दिन से किसी को गुरबत में सड़कों पर ठिठुरते देखा है।''