नई दिल्ली : 2019 लोकसभा चुनाव का बिगुल अभी नहीं बजा है, लेकिन अभी से ही चुनावी योद्धा ताल ठोकते नजर आ रहे हैं। 2019 लोकसभा चुनाव में सबकी निगाहें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी पर टिकी हुई है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि आगामी लोगकसभा चुनाव के लिए एनडीए की ताकत धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है, क्योंकि सहयोगी दलों का एनडीए से मोहभंग होता जा रहा है।

एक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक एनडीए के 16 घटक दल गठबंधन छोड़ चुके हैं। बताया जा रहा है कि अभी एनडीए के पांच और घटक दल भाजपा पर दबाव बनाए हुए हैं और गठबंधन छोड़ने की दबी जुबान से चेतावनी दे रहे हैं।

28 से हो गए थे 42

आपको बता दें कि साल 2014 के चुनावों में भाजपा ने 28 दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। उन चुनावों में भाजपा को 282 और 22 घटक दलों को कुल 54 सीटें मिली थीं। चुनाव के बाद भाजपा ने कई छोटे-छोटे दलों को एनडीए में शामिल किया था। जिसके कारण एनडीए के घटक दलों की संख्या बढ़कर 42 हो गई थी।

ऐसे झिटक रहे दल

धीरे धीरे अब एनडीए के घटक दल गठबंधन छोड़ने की बात कर रहे हैं। अभी हाल ही में असम गण परिषद (एजीपी) ने नागरिकता (संशोधन) बिल के विरोध में एनडीए छोड़ दिया है। साल 2018 के शुरुआत में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) ने एनडीए छोड़कर महागठबंधन में शामिल हो गया।

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फरवरी, 2018 में ही नागालैंड विधान सभा चुनाव के दौरान नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) ने एनडीए से रिश्ते को खत्म कर दिया। मार्च, 2018 में आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने भी एनडीए को अलविदा कह दिया। नायडू आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिए जाने से भाजपा से खफा थे।

पिछले साल पश्चिम बंगाल में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने भी एनडीए छोड़ दिया था। उन्होंने भाजपा पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया था। कर्नाटक में कर्नाटक प्रज्ञावंत जनता पार्टी ने भी भाजपा के साथ गठबंधन तोड़कर कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन का हाथ थाम लिया था।

साल 2018 में ही जम्मू-कश्मीर में गठबंधन सरकार चलाने वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से खुद भाजपा ने गठबंधन तोड़ लिया था। वहां महबूबा मुफ्ती सरकार में भाजपा शामिल थी। इनके अलावा, बिहार के एक और क्षेत्रीय दल मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी ने भी एनडीए छोड़ महागठबंधन का दामन थाम लिया।

2018 के अंत में मोदी सरकार में मंत्री रहे उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी ने भी एनडीए से गठबंधन तोड़ लिया और महागठबंधन में शामिल हो गया।

इससे पहले हरियाणा जनहित कांग्रेस ने भी एनडीए छोड़ दिया था। पार्टी के अध्यक्ष कुलदीप विश्नोई ने बीजेपी पर आरोप लगाया था कि भाजपा धोखा देनेवाली पार्टी है जो क्षेत्रीय दलों को खत्म करना चाहती है।

इसके अलावा कई ऐसी छोटी बड़ी पार्टी है जिन्होंने एनडीए छोड़ दिया है, जिसमें तमिलनाडु की एमडीएमके, डीएमडीके और रामदॉस की पीएमके, आंध्र प्रदेश में तेलुगु स्टार पवन कल्याण की पार्टी जन सेना पार्टी ने एनडीए छोड़ दिया है।

ये दे रहे धमकी

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल का अपना दल भाजपा पर लगातार दबाव बनाए हुए है। राजभर ने तो भाजपा को अल्टीमेटम दे रखा है।

वहीं, दूसरी तरफ महाराष्ट्र में शिव सेना आए दिन भाजपा को आंख दिखा रही है। यहां भाजपा-शिवसेना की दोस्ती खतरे में दिखाई दे रही है। मेघालय के सीएम कोनार्ड संगमा (नेशनल पीपुल्स पार्टी) भी भाजपा को आंख दिखा रहे हैं।

बिहार में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा को एनडीए से अलग होने से फिलहाल तो बचा लिया है, लेकिन लोजपा का संकट अभी टला नहीं है।

खैर आने वाला वक्त ही बताएगा कि ऊंट किस करवट बैठता है, लेकिन फिलहाल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पीएम मोदी पर न केवल 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने का दबाव बढ़ गया है बल्कि सहयोगी दलों को भी एकजुट रखने की भी जिम्मेदारी बढ़ गई है।