नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहाल किये जाने के मात्र दो दिन बाद आलोक वर्मा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली एक सेलेक्ट कमेटी ने गुरुवार को भ्रष्टाचार और कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही के आरोपों में सीबीआई निदेशक के पद से हटा दिया।सीबीआई के 55 सालों के इतिहास में इस तरह की कार्रवाई का सामना करने वाले जांच एजेंसी के वह पहले चीफ हैं।

1979 बैच के आईपीएस अधिकारी वर्मा बुधवार को ड्यूटी पर लौटे थे। एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तो के साथ उनकी वापसी का मार्ग प्रशस्त किया था। सीबीआई चीफ का सिलेक्शन करने वाली तीन सदस्यीय समिति से एक हफ्ते में उनके पद पर बने रहने के बारे में फैसला करने के लिए कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी की एक रिपोर्ट में उनके खिलाफ लगे आरोपों के आलोक में ऐसा किया था। वर्मा का दो सालों का निर्धारित कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त होने वाला था।

अंतरिम निदेशक बने रहेंगे नागेश्वर राव

अधिकारियों ने बताया कि वर्मा को सीबीआई प्रमुख पद से हटाने का निर्णय दो दिनों में सेलेक्ट कमेटी की दूसरी बार यहां हुई बैठक लिया गया। गुरुवार शाम जारी एक सरकारी आदेश में बताया गया कि वर्मा को केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत दमकल सेवा, नागरिक रक्षा और होमगार्ड महानिदेशक के पद पर तैनात किया गया है। सीबीआई का प्रभार अतिरिक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को दिया गया है। सीवीसी की रिपोर्ट में वर्मा के खिलाफ आठ आरोप लगाए गए थे।

दो घंटे चली बैठक में बहुमत से लिया गया फैसला

यह रिपोर्ट सेलेक्ट के सामने रखी गई। समिति में लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के प्रतिनिधि के रूप में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जस्टिस न्यायमूर्ति ए के सीकरी भी शामिल थे।

अधिकारियों ने बताया कि वर्मा को उनके पद से हटाने का फैसला दो घंटे चली बैठक में बहुमत से किया गया। खड़गे ने इस कदम का विरोध किया। यह फैसला स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना और अन्य की उन अर्जियों पर आने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से एक दिन पहले आया। अस्थाना और अन्य ने अपने खिलाफ रिश्वत के आरोपों को लेकर एफआईआर को रद्द करने की मांग की है।

सूत्रों के अनुसार बैठक के दौरान न्यायमूर्ति सिकरी ने कहा कि वर्मा के खिलाफ अरोप हैं जिस पर खड़गे ने कहा, ''आरोप कहां हैं।'' 11 सप्ताह में यह दूसरी बार हुआ कि सीबीआई का प्रभार राव को दिया गया। पहली बार उन्हें प्रभार तब दिया गया था जब वर्मा से उनके अधिकार वापस ले लिये गए थे और उन्हें जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया था। हालांकि इस आदेश को मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।

सीवीसी रिपोर्ट में विवादास्पद मीट कारोबारी मोइन कुरैशी का जिक्र

अधिकारियों ने कहा कि सीवीसी रिपोर्ट में विवादास्पद मीट कारोबारी मोइन कुरैशी मामले का जिक्र किया गया था। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि इसकी जांच करने वाली सीबीआई टीम हैदराबाद के उद्योगपति सतीश बाबू सना को एक आरोपी बनाना चाहती थी, लेकिन वर्मा ने कभी मंजूरी नहीं दी। इस मामले में जांच का नेतृत्व अस्थाना कर रहे थे।

इस भी पढ़ें :

हटाए गए CBI चीफ आलोक वर्मा, पीएम की अध्यक्षता वाली सेलेक्ट कमिटी का फैसला

सीवीसी की रिपोर्ट में रॉ की टेलीफोन निगरानी का दिया गया हवाला

अधिकारियों के अनुसार सीवीसी की जांच रिपोर्ट में खुफिया एजेंसी 'रॉ' द्वारा की गई एक 'टेलीफोन निगरानी' का हवाला दिया गया। रॉ ने एक बातचीत पकड़ी थी जिसमें 'सीबीआई में नंबर एक के हाथों पैसे के कथित लेन-देन' का उल्लेख था। खास बात यह है कि सना, अस्थाना के खिलाफ दर्ज मामले में शिकायतकर्ता है। उसने इस मामले में अपने बिचौलियों को दी गई रिश्वत के बारे में जानकारी दी थी। उसने ‘रॉ' के दूसरे शीर्ष अधिकारी सामंत गोयल के नाम का भी जिक्र किया था जो बिचौलिये मनोज प्रसाद को बचाने में कथित रूप से शामिल थे।

एक अन्य मामला सीबीआई द्वारा गुड़गांव में भूमि अधिग्रहण के बारे में सीबीआई द्वारा दर्ज शुरुआती जांच से संबंधित है। सीवीसी ने आरोप लगाया कि इस मामले में वर्मा का नाम सामने आया था। सीवीसी ने इस मामले में विस्तृत जांच की सिफारिश की थी।

सीवीसी ने यह भी आरोप लगाया था कि वर्मा ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री लालू प्रसाद से जुड़े आईआरसीटीसी मामले के एक अधिकारी को बचाने का प्रयास भी किया था। उसने यह भी आरोप लगाया कि वर्मा सीबीआई में दागी अधिकारियों को लाने की कोशिश कर रहे थे। उसने यह भी आरोप लगाया कि सीबीआई प्रमुख से सहयोग पाने के उसके प्रयास के कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि वह अपनी फाइलों को सीवीसी की पहुंच से दूर रख रहे।