भोपाल: मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपने वचन-पत्र में वादा किया था कि सत्ता में आने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सरकारी कार्यालयों में लगने वाली शाखाओं को बंद किया जाएगा। इसका विधिवत आदेश तो अब तक जारी नहीं हुआ है, मगर नौकरशाहों ने अघोषित तौर पर सामूहिक वंदे मातरम पर रोक लगाकर सरकार की छीछालेदर करा दी है।

राज्य में सत्ता बदली है। इसके साथ ही बदलाव की बयार जारी है। नौकरशाही की सर्जरी का क्रम जारी है। मुख्य सचिव की जिम्मेदारी एस. आर. मोहंती को मिल चुकी है। कांग्रेस सरकार की किसान कर्जमाफी सहित अन्य फैसलों पर अमल हो पाता कि उससे पहले विवादों की शुरुआत हो गई है। पहला विवाद वंदेमातरम गान को लेकर है।

ज्ञात हो कि वर्ष 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के कार्यकाल में हर महीने की पहली तारीख को सामूहिक वंदे मातरम् गायन की शुरुआत की गई थी। यह सिलसिला बीते 13 सालों से अनवरत चला आ रहा था, मगर सत्ता बदलने के बाद की पहली तारीख अर्थात एक जनवरी को ही वल्लभ भवन परिसर में वंदे मातरम् नहीं हुआ। इससे सरकार विवादों में घिर गई है।

भाजपा ने इस मामले को हाथों-हाथ लपक लिया है। क्योंकि सामूहिक वंदे मातरम् गान का आयोजन सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा किया जाता है। वर्तमान में यह विभाग मुख्यमंत्री कमलनाथ के पास है, लिहाजा भाजपा ने सीधे तौर पर कमलनाथ पर हमले तेज कर दिए हैं।

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने कहा, "मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक जनवरी से वंदे मातरम् गायन बंद करके प्रदेश के राष्ट्रभक्त नागरिकों को नए साल का तोहफा दिया है। लेकिन ऐसा करके कांग्रेस पार्टी और कमलनाथ ने आने वाले लोकसभा चुनाव का एजेंडा सेट कर दिया है। कमलनाथ सरकार के इस कदम से साफ हो गया है कि वोट बैंक की राजनीति के चलते कांग्रेस और कमलनाथ भारत के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे लगाने वाले गैंग को राजनीतिक संरक्षण प्रदान करेंगे।"

इस मामले के तूल पकड़ने बाद कमलनाथ को सफाई देनी पड़ी है। उन्होंने कहा है, "हमारी भी धर्म, राष्ट्रीयता, देशभक्ति में आस्था है। कांग्रेस पार्टी, जिसने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी, उसे देशभक्ति, राष्ट्रीयता के लिए किसी से भी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। भाजपा इस पर राजनीति न करे, इसे (वंदे मातरम गायन) नए रूप में लागू करेंगे।"

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अबतक वंदे मातरम की चली आ रही परंपरा के अनुसार, यह सामूहिक गान मंत्रालय परिसर में मंत्री की मौजूदगी अथवा मुख्य सचिव की उपस्थिति में होता आया है। सवाल उठ रहा है कि आखिर किसकी सहमति व रजामंदी से एक जनवरी को वंदे मातरम का समूह गान नहीं हुआ।

प्रशासनिक सूत्रों का कहना है, "इस तरह के कार्यक्रम वल्लभ भवन में बैठने वाले अफसरों की राय से होते हैं। नई सरकार आई है, अफसरों में यह होड़ मची हुई है कि सरकार को कैसे खुश किया जाए।" सरकार के लिए यह खोज का विषय बन गया है, आखिर ऐसा कैसे हो गया।