नई दिल्ली : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ 17 दिसंबर को अपराह्न डेढ़ बजे भोपाल के लाल परेड ग्राउंड में मध्य प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। लेकिन राज्य में विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायकों की नाराजगी जारी है। साथ ही कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के फैसले से ज्योतिरादित्य सिंधिया भी नाराज चल रहे हैं। वह खुलकर कुछ कह नहीं पा रहे हैं।

खैर सभी प्रयास करने के बावजूद ज्योतिरादित्य अपने पिता की तरह एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने से चूक गए। कहा जा रहा है कि कमलनाथ के दावे को मजबूत बनाने में दिग्विजय सिंह का बहुत बड़ा योगदान रहा है। सभी जानते हैं कि राहुल और सोनिया गांधी के सामने उनकी राजनीतिक हैसियत का दायरा कितना बड़ा है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि ज्योतिरादित्य के राजघराने से होने के बावजूद उन्हें दिग्विजय सिंह का साथ क्यों नहीं मिल पाया ? दरअसल इसके पीछे एक ऐतिहासिक कहानी है जिसमें एक राजघराने को दुसरे राजघराने के प्रति अधीन होना पड़ा था।

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वेबसाईट लोकमत के अनुसार, आज से 202 साल पहले 1816 में सिंधिया परिवार के राजा दौलतराव सिंधिया ने राघोगढ़ के राजा जय सिंह को युद्ध में हराया था, जिसके बाद राघोगढ़ को ग्वालियर राज के अधीन होना पड़ा था। लेकिन आज परिस्थितियां अलग है। सिंधिया परिवार के ज्योतिरादित्य सिंधिया को राघोगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह ने बिना युद्ध के मैदान में उतरे मात दे दिया है।

यहीं नहीं दिग्विजय सिंह ने इसका बदला ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधव राव सिंधिया से भी लिया था। 1993 में मध्य प्रदेश में माधव राव सिंधिया को मुख्यमंत्री पद के रेस से बाहर करके उन्होंने खुद सिंहासन संभाला था।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया से राजा बनकर ही सही लेकिन दिग्विजय सिंह ने राघोगढ़ के पराजयी इतिहास का बदला पहले पिता और उसके ढाई दशक के बाद पुत्र से लेकर सिंधिया परिवार को आईना दिखाने का काम किया है। इसी कड़ी में दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह बहुत तेजी के साथ प्रदेश में उभर रहे हैं।