बॉलीवुड के मशहूर निर्माता करण जौहर ने अपने पिता यश जौहर के 'कलंक' बनाने का आइडिया तो पूरा किया है,लेकिन यह फिल्म आज के दौर में फिट नहीं बैठती। संजय दत्त, माधुरी दीक्षित जैसे बड़े सितारे होने के बावजूद यह फिल्म दर्शकों का दिल जीतने में पूरी तरह से फेल रही है। यह कहना सही है कि फिल्म बड़े सितारे और भव्यता के बल नहीं चलती, बल्कि उसमें ऐसा कंटेंट होनी चाहिए जो दर्शकों को सिनेमा हॉल में बैठने के लिए मजबूर कर दें।

यह कहानी आजादी से पहले लाहौर के पास हुस्नाबाद शहर की है। फिल्म में सत्या (सोनाक्षी सिन्हा) को डॉक्टर बताते हैं कि वह एक साल तक जिन्दा रह सकती है। ऐसे में सत्या अपने पति देव (आदित्य राय कपूर) की शादी रूप (आलिया भट्ट) से करा देती है। रूप इसलिए शादीशुदा देव से शादी करने को तैयार हो जाती है कि उसके परिवार पर सत्या के परिवार ने काफी एहसान किये हैं। यही नहीं, रूप पर उसकी दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी भी है। हालांकि देव और रूप की शादी एक समझौता बनकर रह जाती है।

फिल्म में संजय दत्त और माधुरी दीक्षित
फिल्म में संजय दत्त और माधुरी दीक्षित

देव और उसके पिता बलराज चौधरी (संजय दत्त) एक अखबार चलाते हैं। बलराज चौधरी की अखबार का वहां के लोहार इसलिए विरोध करते हैं, क्योंकि अखबार में मशीनों के बारे में खबरें प्रकाशित होती हैं, जिनसे उनकी रोजीरोटी छीनी जाएगी।

उधर, बलराज चौधरी के बदनाम बस्ती हीरा मंडी में रहने वाली बहार बेगाम (माधुरी दीक्षित) से संबंध थे और उनकी नाजायज औलाद जफर (वरुण धवन) है। जफर इस बात से नाराज रहता है कि मां ने उसे पैदा होते हीं सड़क पर छोड़ दिया और पिता ने उसे कभी अपना नाम नहीं दिया। रूप बहार बेगम के पास संगीत सीखने जाती है। सत्या के परिवार के एहसानों तले रूप देव से शादी तो करती है, लेकिन दिल जफर को दे बैठती है। प्यार और नफरत के इस खेल में रिश्ते उलझ जाते हैं।

कहानी कमजोर होने की वजह से उसके आधार पर लिखा स्क्रीनप्ले विश्वसनीयता नहीं बना पाई। पूरी कहानी में कहीं भी इन सवालों का जवाब नहीं मिलता कि आखिर सत्या अपने पति देव की दूसरी शादी क्यों कराना चाहती है? दूसरी तरफ, देव अपनी पत्नी सत्या को बेहद प्यार करता है, लेकिन इसका कहीं जिक्र तक नहीं है। इस सवाल का भी जवाब नहीं है कि पत्नी सत्या से बेइंताह प्यार करने वाला देव आखिर दूसरी शादी के लिए क्यों राजी हो जाता है?

फिल्म का पोस्टर
फिल्म का पोस्टर

रूप के परिवार पर सत्या के परिवार के किस तरह के एहसान है, इसका पूरी फिल्म में कोई जिक्र नहीं है। देव बलराज चौधरी जैसे शहर के नामी व्यक्ति का बेटा है, लेकिन जफर उसे जानता तक नहीं। दूसरी तरफ, बहार बेगम के पास संगीत सीखने पहुंची रूप पूरे बदनाम बस्ती में जफर के साथ घूमती है, लेकिन इसकी खबर देव के परिवार तक नहीं पहुंचती। यही नहीं, जफर और रूप के बीच अचानक प्यार हो जाता है और दोनों में प्यार कैसे शुरू हुई, इसका भी जिक्र नहीं है।

अभिषेक वर्मन बतौर निर्देशक के रूप में दर्शकों को काफी निराश किया है, क्योंकि वर्मन ने बड़े सेट और बड़े कलाकारों से दर्शकों को प्रभावित करने का प्रयास किया है। फिल्म में आवश्यकता से अधिक चमक-धमक, भव्यता ही फिल्म को नुकसान पहुंचाती है। बहार बेगम एक तवायफ है, लेकिन उसकी कोठी कुछ इस तरह सजाया गया है कि मानों किसी महारानी का राजमहल है।

फिल्म की प्रीमियर पर पहुंचे कलंक के कलाकार
फिल्म की प्रीमियर पर पहुंचे कलंक के कलाकार

अभिषेक ने फिल्म के जरिए भावनाओं को व्यक्त करने का प्रयास किया है, लेकिन कहानी में दम नहीं होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। जफर और रूप की प्रेम कहानी भी दर्शकों को पसंद नहीं आई है। यही नहीं, फिल्म में वरुण धवन पर फिल्माए गए एक्शन सीन्स भी कहानी के लिए बिलकुल फिट नहीं बैठते। ये एक्शन सीन इतने लंबे हैं कि दर्शक बोर होने लगता है। फिल्म की पूरी कहानी भी कुछ इसी तरह की है।

हालांकि फिल्म में वरुण धवन का अभिनय काफी अच्छा है, लेकिन उन्हें हिन्दी उच्चारण पर जोर देने की जरूरत है। आलिया भट्ट ने अपनी तरफ से 100 प्रतिशत दिया है, लेकिन उन्हें कहानी ने साथ नहीं दिया। सोनाक्षी सिन्हा स्क्रीन पर बहुत कम समय के लिए दिखाई देती है और उनका रोक उतना महत्वपूर्ण नहीं है। संजय दत्ता का रोल भी खास नहीं है, जबकि माधुरी दीक्षित का किरदार देखने में बिलकुल नकली दिखती है। कुणाल खेमू ने अच्छी कॉमडी की है और कृति सेनान का गाना अच्छा है।