यात्रा फिल्म दिवंगत मुख्यमंत्री डॉ. वाईएस राजशेखर रेड्डी के जीवन पर आधारित है। वाईएसआर के जीवन में राजनैतिक और व्यक्तित्व में बदलाव लेकर आई प्रजा प्रस्थानम यात्रा के संदर्भ में यह फिल्म बनी है। मलयालम के मेगास्टार मम्मूटी ने करीब ढाई दशक बाद 'यात्रा' के जरिए टॉलीवुड में री-एंट्री की है। इस तरह कई विशेषताओं के साथ 'यात्रा' आगे बढ़ी...

कहानी : -

यह एक ईवेंट बेस्ड् बायोपिक है। दिवंगत मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की प्रजा प्रस्थानम पदयात्रा... उस यात्रा के दौरान वाईएसआर को मिला अनुभव, उससे वाईएसआर के व्यक्तित्व में हुए बदलाव पर आधारित है फिल्म की कहानी। वाईएसआर के जीवन में घटी घटनाओं के जरिए उनके व्यक्तित्व को सिल्वर स्क्रीन पर दिखाने की कोशिश की गई है। अपना विश्वास खोकर मुश्किलों से गुजर रही पार्टी को वाईएस राजशेखर रेड्डी ने अपने दम पर किस तरह जीत का स्वाद चखाया, किन कारणों से उन्हें पदयात्रा करनी पड़ी... पदयात्रा राजशेखर रेड्डी के व्यक्तित्व में बदलाव कैसे लेकर आई... यात्रा में उनका क्या अनुभव रहा, यही इस फिल्म की कहानी है।

कलाकार :-

बायोपिक होने से पूरी कहानी केवल राजशेखर रेड्डी के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है। यह कहना होगा की मम्मूटी इस भूमिका में पूरी तरह ढल गए हैं। मम्मूटी की दमदार एक्टिंग की बदौलत पहले शॉट से ही पर्दे पर देखने वालों को लगता है कि वे सही में वाईएसआर को देख रहे हैं।

राजशेखर रेड्डी की विनम्रता, राजनीति तथा विश्वास करने वालों के लिए कुछ भी कर गुजरने जैसी बातों को पर्दे पर अद्भूत तरीके से पेश किया गया है। राजा रेड्डी की भूमिका में जगपति बाबू केवल दो बार पर्दे पर नजर आए, उनकी एक्टिंग में दम दिखता है। विजयम्मा की भूमिका में अश्रिता बिल्कुल फिट दिखी हैं। पर्दे पर कुछ समय के लिए दिखाया गया विजयम्मा का रोल सदैव याद रहेगा।

फिल्म का पोस्टर 
फिल्म का पोस्टर 

रावु रमेश ने अपने दमदार अभिनय से केवीपी के किरदार में जान फूंक दिया है। अनुसूया, सुहासिनी, पोसानी कृष्णमुरली पर्दे पर बहुत कम समय के लिए नजर आए, लेकिन उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा इंसाफ किया है।

विश्लेषण : -

ये वाईएस राजशेखर रेड्डी की कहानी नहीं है। वाईएसआर की राजनीति कैसे होती थी? बात और विश्वास वाईएसआर के लिए क्या मायने रखते थे? वाईएसआर उनपर विश्वास रखने वालों को किस तरह का भरोसा देते थे? पदयात्रा से पहले और पदयात्रा के बाद वाईएसआर में क्या बदलाव आया? आदि को लेकर वाईएस राजशेखर रेड्डी के व्यक्तित्व को सिल्वर स्क्रीन पर बखूभी दर्शाया गया है। पदयात्रा में वाईएसआर लोगों से किस तरह मिले, उनके कष्ट समझने जैसे दृश्य दर्शकों को बांधे रखते हैं।

राजशेखर रेड्डी के 'अपने दुश्मन की बेटी जब घर का चौखट लांघ कर मदद मांगती है तो उससे कैसी राजनीति' का डायलॉग सुनकर हर कोई उनकी तारीफ करने से नहीं चूकता। पार्टी हाइकमांड के बड़े नेता जब राजशेखर रेड्डी से अकेले में बात करने की इच्छा जाहिर करते हैं तो वे बगल में केवीपी के मौजूद रहने के बाद भी उनसे कहते हैं कि आप समझिए कि मुझसे अकेले में बात कर रहे हैं। वाईएसआर की इस बात से समझ सकते हैं कि वे दोस्ती को कितना महत्व देते थे।

बात देने से पहले सोचना चाहिए, एक बार बात देने के बाद तो आगे ही बढ़ना है। इस डायलॉग से समझ सकते हैं कि उनमें विश्वसनीयता कितनी थी। पार्टी हाईकमांड के बड़े नेताओं से यह कहना कि 'मैं पार्टी का केवल ईमानदार कार्यकर्ता हूं, गुलाम नहीं' वाईएसआर के धैर्य को दिखाता है। मार्केट में आत्महत्या करने गए किसान से वाईएसआर का यह कहना कि मैं सुना हूं... मैं तुम्हारे साथ हूं...यह सीन भी उनके भीतर के छिपे नेता की याद दिलाती है।

फिल्म का पोस्टर 
फिल्म का पोस्टर 

अपने विश्वासपात्र पुलिस कांस्टेबल के गलती करने पर उसकी अनदेखी किए बिना और अपनी बदनामी से डरे बिना वाईएसआर का यह कहना कि 'मेरे लिए उसकी गलती को माफ कर छोड़ दो' उनकी दरियादिली को प्रतिबिंबित करता है।

पदयात्रा चेवेल्ला से शुरू करना अशुभ होने की आशंका व्यक्त करने वाली सबिता इंद्रारेड्डी से यह कहना कि साफ दिलवाले मनुष्य हैं, तो मुहूर्त से क्या लेना-देना' एक भाई का बहन को दिए जाने वाला भरोसा दिखता है। इस तरह निर्देशक ने मही वी राघव ने फिल्म की हर सीन में राजशेखर रेड्डी के एक गुण को पर्दे पर दिखाने का प्रयास किया है। गांव के एक घर में भोजन करना, अस्पताल में वाईएसआर के सामने एक बच्ची की मौत होना, मार्केट में आत्महत्या की कोशिश करने वाले किसान से बात करना जैसे सीन देखकर दिलभर आता है।

फिल्म के एक दृश्य में मम्मूटी 
फिल्म के एक दृश्य में मम्मूटी 

निर्देशक मही वी राघव ने रेगुलर बायोपिक की तरह केवल कहानी पेश करने की कोशिश नहीं की है। फिल्म के पहले सीन से दर्शकों को बांधकर रखते हुए उन्हें भी राजशेखर रेड्डी के साथ यात्रा कराने का प्रयास किया है। हर दर्शक को पदयात्रा का हिस्सा बनाया है। तत्कालीन राजनीति, सामाजिक परिस्थितियों को बखूबी दर्शाया गया है। जगह-जगह राजनीतिक व्यंग भी सुनने में आते हैं। खास करके राज्य के बड़े नेता और उनके डायलॉग्स फिल्म में कॉमेडी टच देते हैं।

संगीतकार के द्वारा पिरोए गए गाने, बैकग्राउंड म्यूजिक हर सीन को दर्शक के और करीब ले जाते हुए दिखाई देते हैं। श्रीकर प्रसाद एडिटिंग और सत्यन सूरन की सिनमेटोग्राफी काफी अच्छी है। फिल्म के लिए एक प्लस प्वाइंट सिरिवेन्नेला सीताराम शास्त्री द्वारा लिखे गए गाने हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सिरिवेन्नेला सीताराम शास्त्री ने वाईएसआर के व्यक्तित्व को शब्दों में पिरोया है।

आखिर में आने वाले पेंचलदास का गाना हर दर्शक को रोने के लिए मजबूर कर देता है। अब तक की कहानी फिल्म का एक हिस्सा है तो क्लाइमैक्स में वाईएस राजशेखर रेड्डी के सीन्स दूसरा हिस्सा है। तब तक वाईएसआर की महानता जानकर खुश होने वाले दर्शकों को आखिर में दिखाया जाने वाला रियल फूटेज हिलाकर रखता है। एक बार फिर वह काला दिन याद आता है।