जलसंकट, जलप्रबंधन, जल आंदोलन और जवाबदेही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण में अपने बजट भाषण में बताया था कि देश के करीब 256 जिले भयानक जल संकट से जूझ रहे हैं. इसस निपटने के लिए ठोस एक्शन प्लान की जरूरत है। देश में जल संकट पर चार दशक से चिंता जताई जा रही है. इस बीच आबादी लगभग दोगुनी से भी ज्यादा हो गई। यानी तबसे पानी की न्यूनतम जरूरत भी दोगुनी हो गई है। लेकिन इस दौरान वर्षा जल के भंडारण का इंतजाम बहुत कम बढ़ा है. फिर क्या चमत्कार है कि आज पानी की कमी से उतना हाहाकार नहीं है। सरकार तो जब तब कहती रहती है कि पानी का पर्याप्त भंडारण है। आखिर यह इंतजाम हो कहां से रहा है? देश और राज्य सरकारों के पास जल प्रबंधन के लिए कोई ठोस एक्शन प्लान नहीं है।

हर साल देश में इस तरह की समस्या आती हैं। प्रधानमंत्री जहां जल आंदोलन की बात करते हैं, वहीं जल शक्ति अभियान की शुरुआत की गई है। इस अभियान का मकसद ये है कि मानसून के दौरान पानी का संरक्षण कर जल सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। जल संकट तो तब भी था जब पहली बार नरेंद्र मोदी के हाथ में देश की बागडोर आई थी, लेकिन उस वक्त या उससे पहले इससे निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए. भारत को प्रकृति से जितना पानी मिलता है, दशकों से उतना ही मिल रहा है, लेकिन प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता भारत में घटती चली गई है।

वर्षा के रूप में प्रकृति से मिलने वाले चार हजार अरब घनमीटर में से हम सिर्फ एक हजार आठ सौ अरब घनमीटर को ही उपलब्ध जल मानते हैं, लेकिन लचर जल प्रबंधन की वजह से देश में वर्षा से मिला सतही जल का भंडारण उतना नहीं हो पाता। नतीजतन, पानी की बढ़ी जरूरत भूजल का दोहन करके होती है। बेशक सतही जल के प्रबंधन पर ज्यादा निवेश करके इस काम को साधा जा सकता था, लेकिन यह करने के बजाय अप्रत्यक्ष रूप से भूजल पर निर्भरता बढ़ाई जाती रही।

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

इस बार देश में जल संकट से निपटने के लिए सरकार गंभीर दिखाई दे रही है. खासकर गर्मियों के दिनों में पानी राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है और बारिश में भी पानी ज्यादा बरसने से भी ये राष्ट्रीय मुद्दा बना रहता है। मौजूदा सरकार की नीतियों पर नजर दौड़ाएं तो जल प्रबंधन को लेकर अब सरकार जवाबदेही तय करने की स्थिति में आ गई है, लेकिन सवाल ये है कि इतनी देर से क्यों ? जिस बुनियादी समस्या से आम आदमी जूझ रहा था अब वो इतनी देर से सराकर के एजेंडे में क्या आई है?

विकास को प्रभावित कर रहा है पानी

ऐसे समय में जब देश के ज्यादातर हिस्सा में जल संकट बड़ा होता जा रहा है तब ‘न्यू इंडिया’ के लिए पानी का होना सबसे पहली जरूरत है। देश की बड़ी आबादी पानी ना होने पर पानी के लिए और पानी होने पर पानी से बचने के लिए श्रम करती है। देश के मानव संसाधन का बड़ा हिस्सा पानी के इंतजाम या बदइंतजामी की वजह से खप रहा है। जल संकट की वजह से युवाओं की भी बड़ी आबादी प्रभावित हो रही है क्योंकि जिस इलाके में सूखा या बाढ़ के हालात होते हैं वहां पर रहने वाले बच्चे भी उससे व्यापक रूप से प्रभावित होते हैं। बच्चों की पढ़ाई लिखाई प्रभावित होती है और महिलाओं की सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है।

अमेरिका के पास प्रति व्यक्ति दो हजार एक सौ तिरानबे घनमीटर पानी जमा करने की क्षमता है। ऑस्ट्रेलिया की यह क्षमता तीन हजार दो सौ तेईस घनमीटर है। ब्राजील प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष दो हजार छह सौ बत्तीस घनमीटर जल रोक कर रख लेता है।

कांसेप्ट फोटो
कांसेप्ट फोटो

चीन तक हमसे दोगुना यानी प्रति व्यक्ति चार सौ सोलह घनमीटर पानी संचित कर लेता है। कई देश तो ऐसे हैं, जो वर्षाजल के एक बार इस्तेमाल के बाद उसे बार-बार इस्तेमाल करने लायक बना लेते हैं। वे अपनी जल उपलब्धता से ज्यादा भंडारण दिखा सकते हैं। भूजल की समस्या का रूप और उसका समाधान ढूंढ़ने के लिए जल सांख्यिकी को समझने के अलावा कोई चारा नहीं। भूजल के आंकड़ों की नई समीक्षा किए जाने की सख्त जरूरत है।

गौरतलब है कि हमारी जल भंडारण क्षमता सिर्फ दो सौ सत्तावन अरब घनमीटर ही है, यानी चार सौ तैंतीस अरब घनमीटर पानी बारिश के दिनों में बाढ़ की तबाही मचाता हुआ समुद्र में वापस जा रहा है। हमारे किसानों को खेती के लिए भूजल का इस्तेमाल बढ़ाना पड़ रहा है। नए कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स के मुताबिक इस समय देश में बासठ फीसद सिंचाई भूजल से ही की जा रही है. गांव में जरूरत का पचासी फीसद पानी जमीन से ही निकाला जा रहा है।

कृषि और उद्योग हो रहे प्रभावित

आप अगर निवेशकों आकर्षित करना चाहते हैं या नए उद्योग स्थापित करना चाहते हैं तो आपको वही इलाके चाहिए जहां पर सूखा या बाढ़ का असर ना हो। अगर कोई इलाका सूखा या बाढ़ से प्रभावित है तो वहां पर उद्योग-धंधों की स्थापना नहीं की जा सकती। ऐसे वक्त में जहां पर देश के ज्यादातर राज्यों में जल संकट किसी ना किसी रूप में बना हुआ है तब सरकार इसे दूसरे किए बगैर नए निवेशकों या उद्योगों को आकर्षित नहीं सकती। पानी का संकट कारोबार चौपट कर देगा और नए लोग नई ईकाईयों की शुरुआत करेंगे नहीं। लिहाजा सरकार जल संरक्षण और जल प्रबंधन को लेकर गंभीर हुई है। आप नीति आयोग की ही रिपोर्ट देखें तो देश की राजधानी दिल्ली के साथ ज्यादातर बड़े शहर पानी की कमी से जूझ रहे हैं।

इसी तरह पानी की कमी कृषि क्षेत्र को भी प्रभावित कर रही है। खेती और पशुपालन की जीडीपी में 17 प्रतिशत की हिस्सेदारी है और देश की बड़ी आबादी जीवनयापन के लिए इससे पर निर्भर है। हिस्सेदारी होने के बावजूद देश की आधी से अधिक आबादी अपनी आजीविका के लिए इन पर ही निर्भर है। बावजूद इसके खेती योग्य जमीन के करीब एक-तिहाई हिस्से को ही सिंचित करने की व्यवस्था है। पानी ना बरसे तो सूखा और बरसे तो बाढ़ खेती को बर्बाद कर देते हैं कृषि मंत्रालय के आंकड़ों पर गौर करें तो अब तक खरीफ फसलों की बुआई केवल 234.33 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है। यह आंकड़ा बीते साल के मुकाबले 27 प्रतिशत से कम है। साल 2018 की समान अवधि में 319.68 लाख हेक्टेयर में फसल लगाई जा चुकी थी। खरीफ में धान सबसे ज्यादा होता है जिसमें पानी ज्यादा चाहिए। जल स्तर नीचे चला गया है और देश के कई इलाके डार्क ज़ोन घोषित कर दिए गए हैं। जब तक पानी नहीं बरस रहा था सूखा था लेकिन अब पानी ही पानी है और इसे डंप करने या इसके प्रबंधन के लिए कोई इंतजाम नहीं हैं.।

चैक डैम और छोटे छोटे बंधे लगाकर पानी की रिफिलिंग कराई जा सकती है मगर इस ओर कभी सोचा हीं गया। जल प्रबंधन के साथ-साथ खेती के पैटर्न को बदलने जोर नहीं दिया गया। हालात बेकाबू हो गए तो सरकार जल आंदोलन की बात कर रही है।

पानी कोई पैदा नहीं करता। इसके लिए समाज और सरकार दोनों बराबर के दोषी हैं। पानी के प्रबंधन को लेकर सरकारों के पास कोई एक्शन प्लान नहीं है, बारिश के बाद अगली गर्मियों में जब सूखा पड़ेगा तभी हम वहीं खड़ें होंगे जहां अभी हैं..। क्या मौजूदा सरकार जल संकट से निपटने के लिए अपनी जवाबदेही तय करेगी ? क्योंकि जल आंदोलन के साथ जवाबदेही भी तय करनी पड़ेगी और एक तय समयसीमा में हमें योजनाओं को अमल में लाना पड़ेगा। तब जाकर हम भविष्य में जलप्रबंधन के पुख्ता इंतजाम कर पाएंगे।

विश्व में उपलब्ध कुल जल में भारत के हिस्से चार फीसद जल है। लेकिन पूरी दुनिया में जमीन से जितना पानी उलीचा जाता है, उसका पच्चीस फीसद सिर्फ भारत में उलीचा जा रहा है।

( वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार एस. हनुमंतराव की कलम से...)