नई दिल्ली : गोटाभाया राजपक्षे ने श्रीलंका के आठवें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली और शपथ लेने के बाद उन्होंने सबसे पहले भारत का दौरा किया। उनका ये दौरा कई मानों में अहम है। विदेश नीति गोटाभाया के आगे एक प्रमुख चुनौती है, ऐसा माना जाता है कि सिरिसेना की ही तरह गोटाभाया भी चीन के क़रीब हैं, ऐसे में उनके इस दौरे की अहमियत और भी बढ़ जाती है।

श्रीलंका और भारत के बीच सिर्फ़ आर्थिक संबंध नहीं है बल्कि दोनों के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं। ऐसा नहीं है कि गोटाभाया भारत को नज़रअंदाज़ करके चीन से नज़दीकी बढ़ाएंगे। लेकिन चीन के असर को भी नजर अंदाज नहीं कर सकते। क्योंकि चीन श्रीलंका की आर्थिक मदद करता है। ऐसे में यह काफी दिलचस्प होगा कि वह भारत के साथ रिश्ते को किस तरह से लेकर चलते हैं।

दस साल से अधिक समय से चीन श्रीलंका को वित्तीय रूप से मदद कर रहा है। भारत के मुक़ाबले चीन ने लगातार श्रीलंका में निवेश किया है और देश को कर्ज के तले दबा दिया है। चीन श्रीलंका के साथ अपने संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है क्योंकि वो हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करना चाहता है। वो श्रीलंका में भारी निवेश भी कर रहा है। दूसरी तरफ पिछले सालों में भारत ने धीरे-धीरे श्रीलंका पर अपनी पकड़ खोई है।

विदेश नीति उनके आगे सबसे बड़ी चुनौती है, हिंद महासागर में श्रीलंका सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण देश है। चीन चाहेगा कि श्रीलंका जैसे मित्र उसकी मदद करते रहें।

गोटाभाया राजपक्षे राष्ट्रपति बने तो भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर उन्हें बधाई देने कोलंबो पहुंचे और उन्होंने उन्हें भारत आने का न्यौता दिया. उन्होंने इस न्यौते को स्वीकार किया और वो 29 नवंबर को भारत दौरे पर पहुंचे.

ये पहली बार है कि भारत को श्रीलंकाई राष्ट्रपति को भारत बुलाने की इतनी जल्दी थी इसके पीछे की बड़ी वजह है श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे का चीन की तरफ झुकाव। भारतीय नेतृत्व को लगा कि कही सालों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए राजपक्षे चीन के दौरे पर न निकल जाएं, इसलिए विदेश मंत्री ने जरा भी देरी न करते हुए उन्हें भारत आने का निमंत्रण देने श्रीलंका पहुंच गए।

हंबनटोटा बंदरगाह विकसित करने में श्रीलंका की मदद कर और श्रीलंका में अपनी पंडुब्बियां पहुंचा कर चीन पहले ही श्रीलंका से संबंध बेहतर और दोस्ताना कर चुका है। भारत और श्रीलंका के संबंधों को बेहतर करने के लिए भारत को कई मुद्दों पर काम करना होगा। गोटाभाया राजपक्षे का ये पहला भारत दौरा है तो इस दौरान किसी भी समझौतों पर बातचीत या हस्ताक्षर की उम्मीद नहीं है। हालांकि यह भारत की कूटनीति जीत कही जा सकती है क्योंकि राष्ट्रपति बनने के बाद राजपक्षे सबसे पहले भारत दौरे पर आए।

भारत ने श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे के पहुंचने के कुछ घंटों के भीतर ही पड़ोसी देश के लिए 45 करोड़ डॉलर की वित्तीय मदद की घोषणा तक दी, जिसमें पांच करोड़ डॉलर की मदद आतंकवाद से लडऩे के लिए दी गई है।

श्रीलंका पिछले एक साल से घरेलू उठापटक के दौर से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और श्रीलंका के राष्ट्रपति के बीच आधिकारिक बैठक में मुख्य रूप से आतंक से लडऩे में सहयोग पर चर्चा हुई। राजपक्षे ने इस बारे में भी चर्चा की कि उनकी सरकार आतंकवाद से मुकाबले में भारत को सहयोग देना चाहती है।

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राजपक्षे की यात्रा को एक अहम कदम के रूप में देखा जा रहा है। खास तौर से ऐसे समय जब श्रीलंका आने वाले समय में बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की योजना बना रहा है। और भारत मदद के लिए कदम बढ़ा रहा है लेकिन चीन के मुकाबले काफी कम है।

जिस तरह की गर्मजोशी दोनों देशों के बीच देखी जा रही है उससे लगता है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते आगे बढ़ेंगे क्योंकि भारत के आमंत्रण पर गोटबाया ने बगैर किसी देरी के भारत का दौरा किया है लेकिन वो चीन को दरकिनार करके भारत के साथ रिश्ते आगे बढ़ाने पर जोर देगे ऐसा भी नहीं होगा।

गोटबाया ने पहला दौरा भारत का जरूर किया है लेकिन वो चीन की ताकत को बखूबी जानते और समझते हैं और खुद गोटबाया का झुकाव काफी हद तक चीन की तरफ रहा है। अब ऐसे में भारत और श्रीलंका के बीच रिश्ते किस रास्ते पर कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं फिलहाल भविष्य के गर्भ में है क्योंकि चीन अपना प्रभाव किसी भी कीमत पर कम नहीं होने देगा।

( वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार एस. हनुमंतराव की कलम से......)