बाग में पहुंचा टहलता

सोचता था

दो घड़ी को मन बहलता।

देखकर एक फूल सुंदर सा सलौना

था प्रकृति के हाथ का नन्हा खिलौना।

डाल पर था झूमता

कुछ मुस्कुराता मौन स्वर में

गीत भी था गुनगुनाता।

कर रहा अठखेलियां

देखा पवन से।

कर रहा रंगरेलियां देखा भ्रमर से।

आ गई तबीयत

न खुद को रोक पाया।

बढ़ गया उस ओर हाथ आगे को बढ़ाया।

पुष्प ज्यों ही हाथ आया

तीव्र गति से हंसा-खिलखिलाया।

ज्योति जैसे जगमगाती

दीप के अंतिम वीर जैसे मुस्कुराता

युद्ध में हर क्षण।

रह गया निस्तब्ध यह कैसी हंसी है?

जो मृत्यु रुपी हाथ में

आकर फंसी है।

पुष्प फिर भी मुस्कुराकर कर रहा था व्यंग्य

वाटिका का पुष्प हूं जीवन क्षणिक है।

तोड़कर मुझको चढ़ा दो।

देवता पर या चढ़ा दो

वीर की बलि वेदिका पर।

या प्रेयसी के जूट का श्रृंगार कर लो।

मनचलो मसलो सुरभि लो

फेंक दो मुझको धरा पर।

तोड़ लो तो भी मैं सूखूंगा

छोड़ दो तो भी मैं सूखूं

- हरिविष्णु अवस्थी