नई दिल्ली : देश में 17वीं लोकसभा के लिए चुनाव चल रहे हैं। रविवार को अंतिम चरण का मतदान होना है। जैसे ही शाम छह बजेंगे, सभी टीवी चैनल्स, न्यूज वेबसाइट और अखबार अपने-अपने एग्जिट पोल लेकर जनता के सामने होंगे। 23 मई को मतगणना होनी है, इससे पहले सभी चैनल्स और वेबसाइट एक स्थिति तय कर देते हैं कि देश में अगली सरकार किसकी हो सकती है। क्या आपको मालूम है कि पहली बार एग्जिट पोल की शुरुआत किसने और कब की थी?

क्या होता है एग्जिट पोल

मतदान के बाद सभी के मन में यह उत्सुकता बनी रहती है कि आखिर देश में अगली सरकार किसकी होगी। ना सिर्फ आम जनता बल्कि नेताओं और उनकी पार्टियों में भी यह तमाम कयास लगाए जाते रहते हैं कि कहां, किस पार्टी को कितनी सीट मिलेगी। एग्जिट पोल इन्ही जिज्ञासाओं को दूर करने का एक माध्यम है।

एग्जिट पोल के जरिए मीडिया हाउस कुछ आंकड़े पेश करते हैं, जिसे वास्तविक चुनाव परिणाम के आस-पास माना जाता है। हालांकि ऐसा हर बार नहीं होता है। एग्जिट पोल जनता से पूछे गए सवाल और उनके जवाब के आधार पर तैयार किया जाता है। जरूरी नहीं होता कि यह सही ही हो, लेकिन ज्यादातर एग्जिट पोल वास्तविक परिणाम के आसपास होता है।

कैसे होता है सर्वे

एग्जिट पोल तैयार करने से पहले एक सर्वे होता है। सर्वे से मिले तथ्य के मद्देनजर ही एग्जिट पोल तैयार किए जाते हैं। चुनाव के दौरान मतदाताओं से बातचीत, उम्मीदवारों की राय और संबंधित सीट पर पूर्वानुमान के आधार पर एग्जिट पोल के आंकड़े तैयार किए जाते हैं।

वोटिंग के दिन जब मतदाता वोट डालकर निकल रहा होता है, तब उससे पूछा जाता है कि उसने किसे वोट दिया। इस आधार पर किए गए सर्वेक्षण से जो व्यापक नतीजे निकाले जाते हैं. इसे ही एग्जिट पोल कहते हैं।

यह भी पढ़ें :

क्या आप जानते हैं अखिलेश यादव और उनके इन तीन बंदरों का मतलब

जानिए पहली बार किस नेता ने मोदी को ‘फेंकू’ और राहुल गांधी को कहा था ‘पप्पू’

किसने शुरू किया एग्जिट पोल?

बीते कुछ सालों में एग्जिट पोल का चलन बेहद बढ़ गया है। देश के किसी भी कोने में चुनाव होता है, टीवी चैनल्स और वेबसाइट अपना एग्जिट पोल जरूर लेकर आते हैं। दर्शकों में भी इसे लेकर खासा उत्साह होता है।

सबसे पहले एग्जिट पोल की शुरुआत नीदरलैंड के मार्सेल वॉन डैम ने की थी। उन्हें ही इस बात का श्रेय जाता है। मार्सेल वॉन डैम ने 15 फरवरी, 1967 को पहली इसका इस्तेमाल किया था। भारत में एग्जिट पोल की शुरुआत का श्रेय इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन के मुखिया एरिक डी कोस्टा को जाता है।