लोकसभा चुनाव 2019 में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को इस बात का अहसास है कि वह अपने दम पर सबसे बड़ी पार्टी के रुप में नहीं उभरेगी। इस बात को समझने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके पास ऐसे मुद्दे ही नहीं है, जिसके बल पर वह सत्ता पक्ष को मात दे सके।

यदि यह मान भी लेते हैं कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में न केवल विफल हुए हैं, बल्कि भारतीय राजनीति में एक कपटी शासक के रूप में उभरे हैं। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी सच्चाई हो सकती है। लेकिन, महज इन बातों से यह मतलब नहीं है कि कांग्रेस को वोट किया जाए। सवाल उठता है आखिर क्यों?

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी पीएम मोदी पर बेहद गंभीर और संगीन आरोप लगा रही है। आरोपों को देखकर लग रहा है कि राहुल गांधी को वोट दिया जाए। लेकिन यदि मोदी बुरे हैं तो कांग्रेस और राहुल गांधी को ही वोट क्यों दिया जाए।

इन दिनों चलने वाले टीवी और टीवी मार्केटिंग में आईपीएल लाइव टेलीकास्ट के दौरान 30 मिनट के विज्ञापन के लिए कैमरा वर्क, एडिटिंग, रि-रिकॉर्डिंग सहित अन्य पर जो मेहनत होती है, उसके अलावा बेसिक स्टोरीबोर्ड की सख्त जरूरत होती है। ऐसे ही कांग्रेस ने केवल मोदी के और किसी मुद्दे को नहीं उठाया। सच्चाई यह है कि चुनाव सिर्फ मोदी पर ही केंद्रित नहीं हो सकता। इसका मुख्य कारण है कि नकारात्मक प्रचार कारगर नहीं साबित हो सकता है।

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी चुप हैं। उन्होंने मॉब लिंचिंग से लेकर बालाकोट एयर स्ट्राइक तक मोदी सरकार पर हमला करते रहे। लेकिन वह इन बातों के अलावा अन्य कोई ऐसा एजेंडा नहीं ला सके, जिसे देश की जनता पसंद करें।

'सूट-बूट की सरकार', 'गब्बर सिंह टैक्स', 'चौकीदार चोर है' जैसे नारे काफी चर्चा में रहे और जनता ने उसे स्वीकार भी किया। लेकिन आज के दिन वह उसी तरह आउटडेटेड हैं, जैसे बाबा सहगल और दलेर मेंहदी के पॉप सॉग्स। इन सब के बीच भाजपा ने कांग्रेस को उसी के चक्रव्यूह में फंसा दिया। 'चौकीदार चोर है' के नारे पर 'मैं भी चौकीदार' इतना भारी पड़ा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर हर किसी ने इसे अपने नाम के आगे जोड़ लिया।

हमने अपने अध्ययन के तहत जो जमीनी हकीकत जानी, उसके मुताबिक राफेल मुद्दा निचले स्तर तक पहुंचा ही नहीं। कांग्रेस का रवैया ऐसा था, जैसे रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे यात्री। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का रवैया बेहद निराशाजनक रहा। उन्हें उम्मीद थी कि जनता मोदी से नाराज होकर कांग्रेस को चुनेगी। चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने नोटबंदी को अपना सबसे बड़ा मुद्दा नहीं

बनाया, जो कि ईमानदारी से कमाने वालों पर सबसे बड़ी चोट थी। पीपुल्स पल्स ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सबसे बड़ा मुद्दा किसानों का

न्यूनतम समर्थन मूल्य, सड़क, पानी बना हुआ है। जिस तरह इन मुद्दों का प्रचार करना चाहिए था कांग्रेस इसे नहीं भुना पाई। इसके अलावा, यूपीए के शासनकाल में 65 हजार करोड़ का किसान ऋण माफी को भी चुनावी हथियार बनाने में विफल रही। बेरोजगारी जो मोदी के कार्यकाल की सबसे बड़ी विफलता थी, उसे भी कांग्रेस नहीं भुना पाई। कांग्रेस सिर्फ इन बातों का जिक्र करती रही कि वह सत्ता में आएगी तो क्या करेगी। उसने महंगाई जैसे मुद्दे को भी नहीं उठाया।

पीपुल्स पल्स ने कई कांग्रेसी नेता और उम्मीदवारों से बात की तो यह सामने निकलकर आया कि खुद पार्टी के नेता यह मान रहे हैं कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी नहीं बनेगी। कांग्रेस ने अपने दस साल के शासन में किसान ऋण माफी, आरटीआई, मनरेगा एवं अन्य मुद्दों को खुद नहीं भुना पाई, जो उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। दूसरी तरफ भाजपा ने उज्जवला योजना और शौचालय निर्माण के मुद्दे को ऐसा भुनाया कि वह मोदी की योजना के तौर पर पहचानी जाने लगी।

अब 'न्याय' का जिक्र करें तो यह भी उतना कारगर साबित नहीं हो रही है, जितनी होनी चाहिए। क्योंकि इससे ना तो किसी कार्यकर्ता का जुड़ाव है और ना ही पार्टी का। इसके ऊपर सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी का लेबल लगा दिया गया है। खुद पार्टी के कार्यकर्ता इस योजना का जिक्र चुनाव प्रचार के दौरान नहीं कर रहे हैं। 'न्याय' के साथ सबसे बड़ा संकट यह है कि खुद पार्टी ही इससे नहीं जुड़ सकी है। इसलिए कांग्रेसी कार्यकर्ता इस योजना के जरिए लोगों के बीच पहचान नहीं बना पा रहे हैं। इतना ही नहीं कई जगह यह बात भी सामने आई है कि खुद कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की ही योजना की जानकारी नहीं है। इसका सबूत है राहुल गांधी की सुस्ती।

उन्होंने दो चरणों के चुनाव के बाद देशवासियों को पत्र लिखने का फैसला किया कि उनकी इस योजना से 1.20 करोड़ गरीब परिवारों को लाभ मिलेगा। जबकि अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बात करें तो वे दशकों से चुनाव से काफी समय पहले से ही अपनी लोकप्रिय योजनाओं के बारे में लोगों को जानकारी देते रहे हैं। इससे साबित होता है कि पिछले पांच सालों में पार्टी ने क्या किया और क्या नहीं किया।

साल 2014 के चुनाव में कांग्रेस को 44 सीटें मिली और उसे 157 निर्वाचन क्षेत्रों में 1 लाख से अधिक वोटों से हार मिरी। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह रही धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा। जिन 157 सीटों पर पार्टी को हार मिली, वहां बताया गया कि कांग्रेस ने वापसी के लिए मूलभूत मुद्दे को नहीं उठाया। माना जा रहा है कि इन सीटों में से कुछ पर कांग्रेस वापसी कर सकती है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इसमें कांग्रेस या राहुल गांधी का कुछ योगदान है। बल्कि इसके पीछे उम्मीदवारों की छवि और उनका काम माना जा सकता है।

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बिहार में 2015 के महागठबंधन का जिक्र करें तो यहां पर कांग्रेस ने अन्य दलों के साथ गठबंधन किया, जिसका परिणाम भाजपा को करारा झटका के तौर पर सामने आया। उसके तीन साल बाद कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने चुनाव बाद जेडीएस से गठबंधन किया और भाजपा को सत्ता से दूर रखा। बाद में हुए उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में सपा, बसपा गठबंधन ने भाजपा को सभी सीटों पर मात दी। इन सभी गठबंधनों को देखकर यह कहा जा सकता है कि भाजपा को किस तरह रोका जा सकता है। जबकि लोकसभा चुनाव के दौरान इस बार कांग्रेस ने भाजपा को रोकने के लिए लेफ्ट और टीएमसी के साथ गठबंधन के लिए कोई जिक्र नहीं किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेरोजगारों को 'पकौड़े बेचने' वाला बयान काफी चर्चा में रहा था। युवाओं में नाराजगी भी थी, लेकिन कांग्रेस यहां भी उसे नहीं भुना पाई। राहुल गांधी को उस वक्त यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई जैसे संगठन के साथ मिलकर प्रदर्शन को धार देनी चाहिए थी और उसको पूरे देश में फैलाना चाहिए था। लेकिन राहुल गांधी यहां भी असफल साबित हुए।