आपने इतिहास में कई बार ‘टीपू सुल्‍तान’ के बारे मेें पढा होगा तो आइए जानते हैं टीपू सुल्तान के बारे में कुछ अनोखी बातें । टीपू सुल्तान का जन्म 20 नवंबर 1750 को कर्नाटक के देवनहल्ली में जन्मे टीपू सुल्तान को भारतीय इतिहास के प्रमुख व्यक्तित्वों में शुमार किया जाता है। 7 दिसंबर 1782 को अपने पिता हैदर अली की मौत के बाद वह मैसूर का शासक बना।

टीपू सुल्‍तान
टीपू सुल्‍तान

इनके पिता एक प्रसिद्ध धर्म गुरु ‘टीपू मस्तान ऑलिया’ को काफी मानते थे और इन्‍हीं के नाम पर उन्होंने अपने पुत्र का नाम टीपू सुल्‍तान रख दिया। इनको शेर-ए-मैसूर के नाम से भी जाना जाता है।

कहा जाता है की टीपू ने बहुत ही कम उम्र में युद्ध की सभी कलाएं सीख ली थीं और वो बहुत ही कम उम्र में सभी युद्ध कलाओ में निपुण हो गए थे। पहलीबार उन्होंने 18 वर्ष की उम्र में अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध लड़ा और जीत गए। अपने पिता हैदर अली के बाद वो 1782 में मैसूर की गद्दी पर बैठे थे। दरअसल टीपू सुल्तान एक बादशाह बन कर पूरे देश पर राज करना चाहते था लेकिन उनकी ये इच्छा पूरी नही हो पाई।

टीपू सुल्‍तान
टीपू सुल्‍तान

दुनियॉ का पहला ‘मिसाइल मैन’ टीपू को कहा जाता है। लंदन के साइंस म्‍यूजियम में इनके रॉकेट आज भी रखे हुऐ हैं। इनकी मृत्‍यु 4 मई सन् 1799 को मैसूर की राजधानी श्रीरंगपट्टनम में युद्ध करते हुए थी।

सबसे ख़ास बात जो टीपू सुल्तान के बारे में है वो ये इनकी तलवार पर रत्नजड़ित बाघ बना हुआ था। इनकी मौत के बाद ये तलवार, इनके शव के पास पड़ी मिली थी। बाढ़ में उनकी यह तलवार 2003 में 21 करोड में नीलाम हुई थी। इस तलवार का वजन 7 किलो 400 ग्राम है।

एक शासक के रूप में अपनी सूझबूझ और साहस के कारण वह लगातार सुर्खियों में रहे। अंग्रेजों से युद्ध करते हुए 4 मई 1799 को श्रीरंगपत्तन में उनकी मौत हो गई, लेकिन ‘मैसूर के शेर' के रूप में उनकी छवि जनमन में हमेशा के लिए दर्ज हो गई।

टीपू सुल्‍तान
टीपू सुल्‍तान

टीपू बहादुर था और उसके जीवन का खासा समय संघर्ष में गुजरा। वह सपने बहुत देखता था और उन्हें अपनी डायरी में दर्ज कर लेता था। उसके सपनों से न केवल उसकी महत्वाकांक्षा का पता चलता है, बल्कि यह भी मालूम होता है कि साम्राज्यवादी अंग्रेजों के रूप में हिंदुस्तान पर मंडरा रहे खतरे को खत्म करने के लिए वह कितना व्यग्र था।

जब अंग्रेज हिंदुस्तान पर गुलामी थोपने वाले थे। वह अंग्रेजों के खिलाफ फ्रांसीसियों को अपने साथ करने में सफल रहा। लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ मराठों और निजाम के साथ एकता का उसका स्वप्न, स्वप्न ही रह गया।