बसंत पंचमी का पर्व विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना का विशेष दिन है। जिसे माघ शुक्ल की पंचमी को मनाया जाता है। मान्यता है कि आज के दिन मां सरस्वती की वंदना से उनकी सदैव कृपा बनी रहती है। आज के दिन प्रयागराज कुंभ में शाही स्नान भी जारी है। इस दिन से बसंत ऋतु का आगमन मानते हैं जिसमें विष्णु व कामदेव का पूजन किया जाता है।

पुरानी कथाओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़क कर चतुर्भुजी सुंदर स्त्री को प्रकट किया था, जिसके हाथ में वीणा, वर मुद्रा, पुस्तक व माला थी। जिनकी वीणा के मधुरनाद से संसार के समस्त जीवों को वाणी प्राप्त हुई। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। मां सरस्वती को शारदा, वीणावादनी, बागीश्वरी, व वाग्देवी के नामों से पूजा जाता है। विष्णु-धर्मोत्तर पुराण में वाग्देवी को आभूषणों से युक्त चतुर्भुजी कहा है।

स्कंद पुराण में सरस्वती जटा-जुटयुक्त, अर्धचन्द्र मस्तक पर धारण किए, कमलासन पर सुशोभित, नील ग्रीवा वाली त्रीनेत्री हैं। सरस्वती ने अपने चातुर्य से देवों को राक्षसराज कुंभकर्ण से बचाया था। संगीत की देवी सरस्वती का जन्मोत्सव वसंत पंचमी पर मनाया जाता है। वसंत पंचमी पर देवी सरस्वती के विशेष पूजन से कटु वाणी से मुक्ति मिलती है, अध्ययन में सफलता मिलती है व असाध्य कार्य पूरे होते हैं।

मां सरस्वती की आराधना करते वक्‍त इस श्‍लोक का उच्‍चारण करना चाहिए:

ॐ श्री सरस्वती शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम्।।

कोटिचंद्रप्रभामुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहाम्।

वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकमधारिणीम्।।

रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्।

सुपूजितां सुरगणैब्रह्मविष्णुशिवादिभि:।।वन्दे भक्तया वन्दिता च मुनीन्द्रमनुमानवै:।