लेखक : देवुलपल्ली अमर

तीन बड़े राज्यों में लाखों गरीब व मध्यम वर्ग के लोगों की जिन्दगीभर की आमदानी लूट चुके शारदा घोटाले की जांच को रोकने के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का धरने पर उतर आना निंदनीय है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई अधिकारी कोलकाता के पुलिस आयुक्त से पूछताछ के लिए पहुंचे थे। बावजूद इसके सीबीआई के अधिकारियों को रोककर अदालत की अवमानना की गई।

सीबीआई अधिकारियों को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराने से इनकर करते हुए आंध्र प्रदेश सरकार ने कर चोरी में लिप्त बड़े व्यापारियों का साथ दिया। ममता और चंद्रबाबू खुद और अपनों को बचाने के लिए व्यवस्था के रक्षकों का नकाब पहने हुए हैं।

इससे पहले पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री अजोय मुखर्जी ने अपने राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ने के विरोध में एक दिन का सत्यग्रह किया था और वे दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे। कांग्रेस छोड़कर बांग्ला कांग्रेस पार्टी की स्थापना के बाद बने गठबंधन सरकार में बांग्ला कांग्रेस के साथ मार्क्सिस्ट पार्टी भी गठबंधन का हिस्स रही थी। उस सरकार में माकपा नेता ज्योति बसु गृहमंत्री थे।

अपनी सरकार की खामियों को उजागर करने के लिए उस दिन अजोय मुखर्जी ने सत्याग्रह किया था। तो अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने अधिकारी को बचाने के लिए विरोध में अनशन किया। लोगों द्वारा चुनी गई सरकार को अगर कोई गिराने की कोशिश करता है, तो उसे रोक नहीं पाने या असहायता की स्थिति में विरोध प्रदर्शन पर उतरना चाहिए।

फिलहाल पश्चिम बंगाल सरकार को गिराने जैसी कोई कोशिश नहीं हो रही है। वास्तव में तीन राज्यों में लाखों गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को चूना (धोखा) लगा चुकी एक संस्था के मामले में जांच को आगे बढ़ने से रोकने के लिए ममता ने यह धरना दिया है।

शारदा घाटाले में पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का हाथ होने के आरोप में कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं। सुप्रीमकोर्ट के निर्देशानुसार ही सीबीआई अधिकारी जब कोलकाता के पुलिस आयुक्त से पूछताछ के लिए पहुंचे, तो न केवल स्थानीय पुलिस ने उन्हें रोका बल्कि सीधे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पुलिस आयुक्त के घर जाना और उन्हें हिम्मत देने के बाद सीबीआई की कार्रवाई के विरोध में धरने पर बैठ जाना किसी भद्दे मजाक से कम नहीं है। एक अधिकारी पर लगे आरोपों की जांच में जुटी सीबीआई को रोकना और केंद्र सरकार के विरोध में मुख्यमंत्री का धरने पर उतरना तत्कालीन अजोय मुखर्जी के समय और वर्तमान सीएम ममता के समय के बदले हुए राजनीतिक मूल्यों को दर्शता है।

केंद्रीय जांच एजेंसियों को राज्यों से जुड़े मामलों की जांच के लिए संबंधित राज्य सरकारों की अनुमति लेनी अनिवार्य है और इसको लेकर कोई विवाद भी नहीं है। परंतु जब अदालत जांच के आदेश देती है, तो उसके लिए यह नियम लागू नहीं होता है। ऐसे मामलों में राज्य सरकार की विशेष अनुमति की जरूरत नहीं होती। इस मामले में भी कोलकाता पुलिस आयुक्त से पूछताछ के लिए सीबीआई के अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही गए थे। बावजूद इसके ममता बनर्जी का उन्हें न केवल रोकना बल्कि अदालत की अवहेलना करते हुए धरने पर बैठना शोचनीय कदम ही है।

सुप्रीम कोर्ट को फिर से कोलकाता के पुलिस आयुक्त से सीबीआई अधिकारियों के समक्ष पेश होने और मामले की जांच में सहयोग देने के लिए कहना पड़ा। लाखों परिवारों को बर्बाद कर चुके घोटाले की जांच में एक अधिकारी को बचाने के लिए खुद मुख्यमंत्री का मैदान में उतरना यह स्पष्ट करता है कि इस मामले में किस का हित छिपा है।

कोलकाता के पुलिस आयुक्त से पूछताछ के लिए सीबीआई द्वारा चुना गया समय, केंद्र सरकार या केंद्र के सत्तारूढ़ राजग का नेतृत्व करने वाली भाजपा के रवैये पर संदेह व्यक्त हो रहे हैं। अगले दो महीने में आम चुनाव होने हैं। राजग मुख्य रूप से भाजपा के विरोध में राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के एक मोर्चा बनना, उस मोर्चा का पिछले सप्ताह कोलकाता में एक विशाल रैली आयोजन करना भी इन संदेहों को बल दे रहा है।

एक समय में ममता बनर्जी भाजपा की दोस्त थी और पिछले राजग सरकार में सहयोगी भी रही। ममता की तरह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्रबाबू नायडू कुछ समय पहले तक राजग के साथ थे। भाजपा के अच्छे दोस्त भी रहे। राजनीतिक स्तर पर अलग होने के बाद चंद्रबाबू सरकार ने हाल ही में आंध्र प्रदेश में सीबीआई के प्रवेश की अनुमति रद्द कर दी है।

चंद्रबाबू के नक्शेकदम पर चलते हुए ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में भी यह निर्णय लिया है। आंध्र प्रदेश प्रदेश में सीबीआई के घुसने से पहले कुछ व्यापारिक संस्थानों व धनिकों पर आयकर अधिकारियों के छापों के बाद चंद्रबाबू सरकार ने किस तरह कार्रवाई की थी, उसे सभी देख चुके हैं। आंध्र प्रदेश सरकार ने आयकर अधिकारियों को पुलिस की सुरक्षा मुहैया करने से इनकार करते हुए कर चोरी करने वाले बड़े व्यापारियों का साथ दिया था।

शारदा घोटाले में आरोपियों को बचाने के लिए प्रतिबद्ध ममता बनर्जी को अपना समर्थन जताने के लिए चंद्रबाबू और उनके बेटे लोकेश तुरंत कोलकाता पहुंचे। ममता बनर्जी ने सीबीआई को पुलिस आयुक्त से पूछताछ करने से रोका था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ममता को झटका देते हुए स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पुलिस आयुक्त को हर कीमत पर पूछताछ के लिए सीबीआई के सामने पेश आना होगा।

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ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि चंद्रबाबू नायडू को इस मामले में ममता बनर्जी की जीत आखिर कहां दिखी? यह बात सच है कि सत्ता में रहने वाले लोगों का कानून व्यवस्था और पुलिस को अपनी मुट्ठी रखना आम बात है। आज चंद्रबाबू और ममता बनर्जी जिस गठबंधन में शामिल हुए हैं, उसी की संप्रग सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सीबीआई के पिंजरे का तोता बताया था।

जो भी सत्ता में होता है, कानून-व्यवस्था और संवैधनिक संस्थाओं का अपने अनुकूल और अपने विरोधियों को राजनीतिक रूप से परेशान करने के लिए इस्तेमाल करना आम बात है। इसके विरोध में जन आंदोलन जरूरी है, क्योंकि राजनीतिक पार्टियों की कहनी और कथनी में काफी अंतर होता है।

राष्ट्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए ही कांग्रेस से दोस्ती का हवाला देने में लगे चंद्रबाबू नायडू को यह समझना होगा कि राजनीतिक रंजिश के लिए तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार का इस्तेमाल इन व्यवस्थाओं व संस्थाओं का दुरुपयोग करने के लिए किया था और बाबू उसके सहयोगी थे।

गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों की जिन्दगी से खेलने वाले शारदा घोटाला जैसा आंध्र प्रदेश में एग्री गोल्ड घोटाला रहा है। इत तरह के अनेक वित्तिय अनियमितताओं व विसंगतियों को लेकर टीडीपी सरकार और उसके सुप्रीमो तथा उनके बेटे, उनके मंत्री और नेता भी आरोपों का सामना कर रहे हैं।

संभवत: केंद्रीय जांच एजेंसियों की नजर इन गड़बड़ियों पर होने की आशंका के चलते पिछले कुछ समय से मुख्य रूप से भाजपा का दामन छोड़ने के बाद से चंदबाबू लोगों से बार-बार उनकी रक्षा में खड़े होने की अपील करते दिख रहे हैं। चार दिन पहले विधानसभा में भी उन्होंने विपक्ष के सदस्यों पर अपना गुस्सा उतारते हुए ऊंची आवाज में कहा कि क्या आप मुझे जेल भेजना चाहते हो। अगर कोई गलती की ही नहीं है तो मुख्यमंत्री को ऐसा क्यों लग रहा है कि उन्हें जेल में रखने का डर सता रहा है। वास्तव में अनशन करने के मामले में ममता बनर्जी चंद्रबाबू को अपना आदर्श मानती है।

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चार साल तक स्पेशल पैकेज का राग अलाप कर अनिवार्य परिस्थितियों में अपनी बात बदलना और फिर से विशेष दर्जे का राग अलापते हुए हर दिन एक नया अनशन कर रहे हैं चंद्रबाबू। गौर करने वाली बात यह है कि ये भी अनशन सरकारी खर्च पर आयोजित किए जा रहे हैं।

सभी मामलों में विपक्षी दल का नकल मारने के क्रम में हाल में विधानसभा में भी काले कपड़े पहनकर अपना विरोध प्रकट किया। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के सदस्यों के विधानसभा में जब काले कपड़े पहनकर अपना विरोध प्रकट करने पर विधानसभा को अपवित्र करने वाली कार्रवाई बताने वाले चंद्रबाबू नायडू और विधानसभा अध्यक्ष कोडेला शिवप्रसाद ने आज उसी विपक्ष का नकल किया।

सत्ता में चाहे कांग्रेस हो या भाजपा हो संवैधानिक व्यवस्थाएं स्वंतत्र रूप से काम कर सके, ऐसी स्थिति नहीं दिख रही है। इसी की आड़ में ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू खुद और अपने लोगों को बचाने के लिए व्यवस्थाओं के रक्षक का नकाब पहन रहे हैं। अब जनता को ऐसे नकाबपोश नेताओं का भंडफोड़ कर उनकी असलियत को सामने लाने की जरूरत है।