ममता ने केसीआर की सुनी, चंद्रबाबू के सियासी चाल पर इस तरह फेरा पानी

ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू की मुलाकात - Sakshi Samachar

के रामचंद्र मूर्ति, संपादकीय निदेशक, साक्षी मीडिया ग्रुप

हैदराबाद: आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नारा चंद्रबाबू का कोलकाता दौरा फुस्स होकर रह गया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बाबू को विपक्षी दलों की बहुप्रचारित बैठक टालने के लिए बाध्य कर दिया। ये मीटिंग 22 नवंबर को नई दिल्ली में प्रस्तावित थी। संयुक्त प्रेस वार्ता में चंद्रबाबू और ममता ने देश को बचाने की बात कही। दोनों की कोशिश साफ झलक रही थी कि वे प्रेस को राजनीतिक घनिष्ठता दिखाएं। वहीं तेलंगाना और पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले अपनी योजना में ममता बनर्जी को साथ लाने में चंद्रबाबू नायडू पूरी तरह विफल साबित हुए।

माना जा रहा है कि ममता बनर्जी चुनावी नतीजों से पहले विपक्षी गठबंधन के नेता के तौर पर राहुल गांधी को मानने से साफ इनकार कर रही हैं। ममता बनर्जी ने बैठक के लिए संभावित तिथि 10 दिसंबर बताई है। हालांकि बैठक की तिथि एक बार फिर पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के हिसाब से टलने की उम्मीद है। तब तक चुनावी नतीजों में कांग्रेस की स्थिति का पता भी चल जाएगा।

कोलकाता बैठक की पहल पूरी तरह चंद्रबाबू नायडू की तरफ से की गई थी, जो खुद को गैर बीजेपी फ्रंट के अगुआ मानने लगे हैं। इससे पहले तेलंगाना के तेरास सहित ममता बनर्जी ने कई क्षेत्रीय दलों से संपर्क किया। उन्हें साफ लगा कि 22 नवंबर की बैठक के गलत संकेत क्षेत्रीय पार्टियों में जाएंगे। तेरास प्रमुख और तेलंगाना के कार्यवाहक मुख्यमंत्री कल्वाकुंटला चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने संभवत: ममता बनर्जी और सतीश मिश्रा (मायावती के सलाहकार) से बात कर उन्हें ऐसा कुछ करने से मना किया, जिससे कि उनकी पार्टी की संभावित जीत पर असर पड़े।

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अगर 22 नवंबर की बैठक राहुल और नायडू के प्रभाव में होता, तो इससे विपक्षी दलों के चुनावी नतीजों पर असर पड़ने की आशंका थी। साथ ही तेदेपा-कांग्रेस के पक्ष में तेलंगाना में माहौल बनने की भी उम्मीद थी। जो केसीआर को कतई गवारा नहीं था। जिस उम्मीद के साथ चंद्रबाबू नायडू ने दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई का दौरा किया उससे राजनीतिक जानकारों को हैरानी हुई। दिल्ली बैठक के बाद और तेलंगाना चुनाव के पहले चंद्रबाबू नायडू खुद को किंगमेकर के तौर पर साबित करते हुए राहुल गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने की फिराक में थे।

सियासी सूझबूझ रखने वाली नेता ममता बनर्जी को चंद्रबाबू की इस चालाकी को भांपने में देर नहीं लगी, और उन्होंने वक्त रहते इस चाल पर लगाम लगा दिया। वो चाहती हैं कि पांचों राज्यों के परिणाम आ जाएं ताकि कांग्रेस के बारे में पता चल सके कि वो कितने पानी में है। ऐसी आम धारणा है कि इस तरह की कवायद से नायडू आंध्रप्रदेश में अपनी सियासी खाल बचाने की जुगत में हैं। राष्ट्रीय टीवी चैनलों के कई सर्वे में ये खुलासा हुआ कि वाईएसआरसीपी नेता जगन मोहन रेड्डी की लोकप्रियता कम से कम दस फीसदी प्वाइंट अधिक है (बाबू की तुलना में)। साथ ही सर्वे में ये भी पता चल रहा है कि वाईएसआरसीपी आगामी लोकसभा चुनाव में 25 में से 20 सीटों पर काबिज होने वाली है। एनडीए से निकलने के बाद चंद्रबाबू अपनी पार्टी तेदेपा को बचाने के अभियान में निकल पड़े हैं। साथ ही उन्हें उनकी घटती लोकप्रियता का अंदाजा भी हो चुका है।

बीते साढ़ें चार सालों में नायडू की विश्वसनीयता घटी है। बीते चार सालों के दौरान भगवा पार्टी का साथ और सत्ता के स्वाद को चंद्रबाबू झुठला नहीं सकते। संवैधानिक संस्थाओं को बचाने के बारे में नायडू के बयानों को कोई गंभीरता से नहीं ले रहा, क्योंकि खुद चंद्रबाबू ने कई बार इनका अपमान किया है। चंद्रबाबू ने प्रदेश में दल बदल कानून के साथ जमकर खिलवाड़ किया। राष्ट्रीय नेताओं को पता है कि YSRCP के 23 विधायकों को बाबू ने खरीदा साथ ही चार विधायकों को मंत्री पद भी दिया। चुनी गई स्थानीय निकायों की शक्तियों को बाबू ने क्षीण किया। वहीं उनके द्वारा बनाई गई जन्म भूमि कमिटी लोगों पर हुक्म चला रही है।

ममता बनर्जी और मायावती सरीखी नेताओं को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के विकास के बारे में अधिक पता नहीं है। इसी तरह उन्हें उन कारकों के के बारे में भी इल्म नहीं है जो आसन्न चुनावों के नतीजों को प्रभावित कर सकती है। ममता बनर्जी और मायावती, दोनों ने ही कांग्रेस-बीजेपी जैसी पार्टियों के साथ एक तरह का व्यापार किया। दोनों नेताओं ने फेडरल फ्रंट और गैर बीजेपी एका के बारे में केसीआर के रोडमैप को भी समझा। कांग्रेस का उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कोई जनाधार नहीं है।

विपक्ष के कई नेताओं के साथ प्रधानमंत्री बनने की चाहत कई नेताओं में हैं। एकबारगी ये नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी राहुल गांधी को परोसने के लिए कतई तैयार नहीं हैँ। राहुल गांधी को बतौर पीएम उम्मीदवार प्रोजेक्ट करने के लिए नायडू की पैरवी को सभी विपक्षी नेता नकार रहे हैं। अगर कांग्रेस पार्टी 150 सीट भी ले आती है तो बाकी क्षेत्रीय दल गैर कांग्रेसी सरकार बनाने की जोड़ तोड़ करेंगी। देव गौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की तरह क्षेत्रीय पार्टियों के नेता कांग्रेस से बाहरी सपोर्ट के दम पर पीएम बनने की हसरत पाले हैं। ऐसा माना जा रहा है कि विपक्षी फ्रंट के नेता के बारे में चर्चा पांच राज्यों के परिणामों के बाद ही लिया जाएगा। लिहाजा चुनावी नतीजों से पहले बैठक का कोई मतलब नहीं बनता है।

वहीं तेरास प्रमुख और तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने खम्मम में एक जनसभा में राहुल गांधी को पीएम बनाने के चंद्रबाबू के प्रयासों पर मजाक उड़ाया। वहीं शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेता भी दशकों से प्रधानमंत्री बनने की हसरत पाले बैठे हैं। उन्होंने भी महीने भर पहले ही कह दिया कि एनडीए के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना तो सही है। लेकिन नतीजों से पहले नेता घोषित नहीं होना चाहिए। साफ लगता है कि चंद्रबाबू की राहें आसान नहीं है।

सन् 1996-98 के दौरान चंद्रबाबू ने हरकिशन सिंह सुरजीत और एम करुणानिधि के साथ मिलकर दिल्ली में सियासी परिस्थितियों से फायदा उठाया था। तब वे संयुक्त आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री थे और उनके पास लोकसभा की 42 सीटें थीं। उस वक्त उन्हें अधिक सम्मान मिला था। कांग्रेस के साथ चंद्रबाबू की तब से छनती आ रही है जब वे मुख्यमंत्री भी नहीं थे। ( 1995 में NT रामाराव के खिलाफ उनके संघर्ष में तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने उनका साथ दिया था।)

चंद्रबाबू की मंशा है कि तेलंगाना में अगर तेदेपा-कांग्रेस की जीत होती है। साथ ही कांग्रेस अगर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ (मिजोरम की अधिक अहमियत नहीं) में से कोई दो राज्य जीत लेती है। तो चंद्रबाबू के विपक्षी गठबंधन के दावे को बल मिलेगा। जिससे उन्हें आंध्र प्रदेश में भी मदद मिलेगी। जैसा कि बाबू कि योजना पर ममता ने पानी फेर दिया है। अब बाबू की ये सियासी चाल पूरी तरह आने वाले चुनावों में कांग्रेस पार्टी की सफलता पर टिकी है। तब तक चंद्रबाबू नायडू को शांत ही रहना होगा।

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