लेखक: रवि वल्लूरी

इलाहाबाद: प्रयाग में त्रिवेणी के तट पर स्थित बड़े हनुमानजी की बड़ी महिमा है। मूर्ति के बारे में रोचक किंवदंतियां हैं। कहा जाता है कि किसी जमाने में कन्नौज में धनिक और संतानहीन व्यापारी रहा करता था। उसके पास अकूत धन संपदा थी, जिसके दम पर वो तमाम भौतिक सुख सुविधा भोग रहा था। बावजूद इसके वो बेटे की चाहत में तड़पा करता था।

पुत्र की इच्छा में व्यवसायी ने विंध्याचल के तलहटी इलाके में भव्य हनुमानजी का मंदिर स्थापित करने की ठानी। कहा जाता है कि विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच व्यापारी ने भव्य मंदिर का निर्माण भी कराया। उसने फैसला किया कि मंदिर में स्थापित की जाने वाली मूर्ति को विभिन्न तीर्थों में स्नान कराया जाय। इसी मकसद से व्यापारी मूर्ति लेकर संगम तटपर भी पहुंचा।

थके मांदे व्यापारी को संगम तट पर पेड़ की छाया में नींद आ गई। इसी दौरान उसने सपना देखा, जिसमें खुद पवनपुत्र ने उसे दिशा निर्देश दिया कि अगर वो इस मूर्ति को इसी अवस्था में छोड़ दे तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।

अगले दिन व्यापारी ने सपने का खयाल करते हुए मूर्ति को प्रयाग क्षेत्र में ही स्थापित करा दिया। फिर वो अपने वतन कन्नौज लौट गया। आज यही हनुमान की मूर्ति प्रयाग की धरती पर बड़े हनुमान के नाम से विख्यात है। जिनकी कृपा से व्यापारी को सर्वगुण संपन्न पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

कुछ अरसा बीतने के बाद हनुमान की भव्य मूर्ति जल में समाहित होने लगी, साथ ही रेत ने मूर्ति को ढकना शुरू कर दिया था। यहां तक कि एक समय मूर्ति पूरी तरह रेत में विलुप्त हो गई।

इसी दौरान एक महात्मा इस इलाके से गुजरे। माघ महीने में त्रिवेणी में डुबकी लगाने के मकसद से महात्मा का आगमन हुआ था। इन साधु महाराज का नाम बालगिरी था।

एक दिन बालगिरी ने अपना त्रिशूल बालू में गाड़ने की कोशिश की तो वो किसी चीज से टकराई। उन्होंने वहां की बालू हटाई तो व्यापारी द्वारा स्थापित की गई भव्य हनुमानजी की मूर्ति निकल आई। साधु बालगिरी के प्रयासों से एक बार फिर बड़े हनुमानजी की मूर्ति प्रतिष्ठापित की गई, जिसे 'श्री विग्रह' नाम दिया गया।

श्री बड़े हनुमानजी का मंदिर
श्री बड़े हनुमानजी का मंदिर

श्री विग्रह को फिर से प्रतिष्ठापित करने के बाद बालगिरी ने हनुमान जी की स्तुति करने के साथ आराधना शुरू की। इस घटना के बाद इलाहाबाद की समृद्धि में इजाफा हुआ। वक्त बीतने के साथ बड़े हनुमान जी की महिमा का विस्तार हुआ। साथ ही दूर दूर से लोग इनके दर्शन और पूजन के लिए पहुंचने लगे।

किंवदंतियों का दूसरा पहलू भी सामने आता है। कुछ लोग कहते हैं कि बालगिरी महाराज ने हनुमानजी की लेटी हुई प्रतिमा को खड़ा करने का भरपूर प्रयास किया था। जिसमें वे सफल नहीं हो सके। जिसके बाद 'श्री बड़े हनुमानजी' की प्रतिमा को किले में स्थापित करने की भी कोशिश की गई। हालांकि ये प्रयास भी बेकार गया। श्रद्धालु हुनुमानजी की भीमकाय मूर्ति को हिलाने तक में सक्षम नहीं हो सके।

लिहाजा श्रद्धालुओं ने मान लिया कि 'श्री बड़े हनुमानजी' की इच्छा नहीं है कि उनका स्थान परिवर्तन किया जाय। इसलिए हनुमान जी की मूर्ति की मूल स्थान पर ही छोड़ दिया गया, और वहीं उनकी पूजा अर्चना शुरू की गई।

त्रिवेणी के तट पर आज भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु रोज 'श्री बड़े हनुमानजी' की पूजा अर्चना करते हैं। साथ ही इनकी मान्यता है कि पवन देव की महिमा से ही इलाहाबाद में समृद्धि आज भी बरकरार है।

इलाहाबाद का समृद्ध इतिहास

गंगा तट पर बसी प्रयाग की धरती यानी इलाहाबाद सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश का प्रुमख शहर है। राज्य के अस्सी लोकसभा क्षेत्रों में इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र भी एक है। प्रचलित कहावत है कि चुनाव में जिसने यूपी जीत ली, दिल्ली की गद्दी उसके नाम होती है।

संगम: जहां गंगा, यमुना और विलुप्त सरस्वती की धाराएं मिलती है
संगम: जहां गंगा, यमुना और विलुप्त सरस्वती की धाराएं मिलती है

मतलब ये कि सियासत में दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर गुजरता है। इसे संयोग ही कहें उत्तर प्रदेश ने देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री दिए हैं। इस फेहरिस्त में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी (हाल ही में देहावसान हुआ), नरेंद्रभाई दामोदर दास मोदी (मौजूदा PM) के नाम शुमार हैं। इन सभी हस्तियों ने यूपी की धरती को चूमा और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के सिरमौर बने।

यहां तक कि दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनने वाले गुलजारी लाल नंदा का नाता भी उत्तर प्रदेश से ही था। इलाहाबाद की बात करें तो हिंदुओं की इस पवित्र तीर्थस्थली में गंगा, यमुना और सरस्वती (अब अदृश्य) के संगम का विहंगम दृश्य लोगों को भाव विभोर करता है।

इलाहाबाद में संगम तट पर अकबर का बनाया किला
इलाहाबाद में संगम तट पर अकबर का बनाया किला

मुगल बादशाह अकबर के बनाए इलाहाबाद किला के काफी नजदीक है संगम। किले के भीतर वास्तुकला के अद्भुत नमूने आपको देखने को मिलेंगे, मसलन सैंडस्टोन से बना अशोक स्तंभ, भूगर्भ में स्थित पातालपुरी मंदिर और पवित्र बरगद का पेड़।

इलाहाबाद की शान में कसीदे गढ़ने वाले कई नामचीन कवियों की पैदाइश इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई। इन हस्तियों में शुमार रहे प्रमुख नाम हैं हरिवंश राय बच्चन और फिराक गोरखपुरी (रघुपत सहाय)। यहां तक कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय को 'पूरब के ऑक्सफोर्ड' की मान्यता भी मिली। जहां से कई नामी गिरामी प्रशासनिक अधिकारी निकले। ये जरूर है कि वक्त के साथ विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा में कमी आई है।

प्रयाग में कुंभ का विहंगम दृश्य
प्रयाग में कुंभ का विहंगम दृश्य

प्रयाग नगरी में हर बारह बरस में लगने वाला कुंभ मेला विभिन्न संस्कृतियों को खुद में समेट लेता है। लाखों की तादाद में श्रद्धालु एक साथ संगम में डुबकी लगाते हैं। इस विहंगम दृश्य को देखने के लिए विदेशों से भी सैलानी जुटते हैं। हिंदू मंदिरों के साथ इस धर्म नगरी में आपको मस्जिद और चर्च भी मिलेंगे। जो सर्वधर्म समभाव की ओर इंगित करते हैं।

इलाहाबाद के बाशिंदे नेहरू जी ने भव्य आनंद भवन और स्वराज भवन कांग्रेस पार्टी को दान दे दिया था। जहां से गांधी जी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई अहम निर्णय लिए थे।

इलाहाबाद की धरती से कई महान क्रांतिकारियों ने दमनकारी अंग्रेजी सरकार के खिलाफ जंग छेड़ी थी। चंद्रशेखर आजाद को कौन नहीं जानता, जिन्होंने गुलामी के दौर में युवाओं में अलख जगाया था। जिसकी कौंध आज भी यहां के युवाओं में देखी जा सकती है।