हैदराबाद : जम्मू कश्मीर में भाजपा के सरकार से हाथ खींचने के साथ ही तीन साल से चली आ रही भाजपा-पीडीपी गठबंधन सरकार का अंत हो गया। भाजपा के समर्थन वापस लेते ही महबूबा मुफ्ती की सरकार ताश के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर गई और मंगलवार को एक नाटकीय घटनाक्रम में इस गठबंधन का अंत हो गया।

पीडीपी और भाजपा के बीच गठबंधन को अपवित्र भले न कहा जाय बल्कि दो विरोधी विचारधाराओं वाला जरूर कहा जा सकता है। इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कश्मीर नीति की असफलता के रूप में देखा जा सकता है, जिसके राज्य में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ गयी थीं और आम लोगों के मौलिक अधिकारों पर खतरा मंडराने लगा था।

जम्मू के प्रभारी बीजेपी महासचिव राम माधव ने दिल्ली में मीडिया के लोगों से पार्टी के निर्णय की जानकारी देते हुए कहा कि गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने से सरकार अस्थिर हो गई है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी राज्य की बिगड़ती कानून-व्यवस्था की स्थिति और जम्मू व लद्दाख क्षेत्र के बीच भेदभाव की भावना से आहत होकर ऐसा निर्णय लिया है।

उन्होंने बार-बार इस बात का जिक्र किया कि वरिष्ठ पत्रकार सुजात बुखारी की हत्या हमारे गठबंधन को तोड़ने के लिए टर्निंग प्वॉइंट्स साबित हुई है। भाजपा नेता ने कहा कि अब समय आ गया है कि राज्य की सत्ता राज्यपाल के हाथ में हो। राम माधव मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि घाटी की स्थिति सुधरने के बाद राजनीतिक प्रक्रिया फिर से शुरू की जा सकती है।

यहां तक कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राज्यपाल एन.एन वोहरा को अपना इस्तीफा भेज दिया है। विपक्षी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी श्रीनगर में राजभवन में वोरा से मुलाकात की। ऐसे में राज्य में गवर्नर का शासन ही एकमात्र विकल्प है।

महबूबा के पास जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 28 सीटें हैं, जो सत्ता में रहने के लिए नेशनल कांफ्रेंस (15 सीटें) और कांग्रेस (12) से समर्थन लेना नहीं चाहती। कांग्रेस ने भी इस बात को साफ कर दिया है कि वह पीडीपी सरकार का समर्थन नहीं करने जा रही है।

प्रगतिशील डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की स्थापना महबूबा मुफ्ती के पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद के द्वारा की गयी थी। मेहबूबा के पिता 1989 में वीपी सिंह सरकार में 1989 गृहमंत्री बने थे। राममाधव ने कहा कि नरेंद्र मोदी ने भी उनसे पीडीपी नेताओं के साथ गठबंधन करने के लिए कहा था।

महबूबा सईद गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने वाली पहली मुख्यमंत्री बनीं, जो लंबे समय तक चली बातचीत के बाद गठित हुई सरकार थी। मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद, मेहबूबा ने लगभग चार महीने का समय लिया और एक गठबंधन का नेतृत्व करने को तैयार हो गईं। इस गठबंधन सरकार में कुछ भी समानता देखने को नहीं मिल सकती थी। बीजेपी और पीडीपी को उत्तरी ध्रुव और दक्षिण ध्रुव के रूप में वर्णित किया जाता रहा है।

इसे भी पढ़ें :

जम्मू-कश्मीर में टूटा बीजेपी-पीडीपी गठबंधन, महबूबा मुफ्ती ने दिया इस्तीफा

पीडीपी और बीजेपी के बीच वैचारिक विसंगति के बावजूद तीन साल सरकार का चलना भी एक आश्चर्यजनक पहलू था। इस सरकार के साझेदार हर मुद्दे पर पहले दिन से एक दूसरे के खिलाफ दिख रहे थे।

जब एनडीए सरकार हुर्रियत नेताओं के साथ बातचीत करने के लिए तैयार नहीं है, तो वहीं महबूबा हुर्रियत नेताओं और अलगाववादियों के साथ ही साथ पाकिस्तान के साथ वार्ता के लिए जो डाल रही थीं। जैसे ही केंद्र सरकार द्वारा सीजफायर को वापस ले लिया गया, वैसे ही महबूबा की नाराजगी बढ़ गयी। इन दोनों के बीच कश्मीर को विशेष स्टेटस देने के सवाल पर भी मतभेद था। शरणार्थियों के मामले का निपटारा भी दोनों के बीच एक और विवादित मुद्दा बनके चलता रहा है। कश्मीरी पंडित घाटी में वापस नहीं आ सके थे।

पत्थर फेंकना नियमित प्रदर्शन का जरिया बन गया था। कठुआ बलात्कार और हत्या की घटनाओं से राज्य में अराजकता की स्थिति जैसी बन गई थी। अब राज्य में चल रही निर्वाचित सरकार गिर गई है और गवर्नर का शासन की मांग की गयी है। अब राज्य में कानून और व्यवस्था का केंद्र पूरी तरह से केंद्र पर निर्भर है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह राज्य की हर गतिविधि के लिए जिम्मेदार होंगे।