इंदौर : अगर चेन्नई स्थित जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री के सामने ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ दावा पेश कर साबित किया गया, तो इंदौर का मशहूर पोहा, लौंग की सेंव, खट्टा-मीठा नमकीन और दूध से बनने वाली शिकंजी की जगह उन पारंपरिक पकवानों की सूची में पक्की हो सकती है जिन्हें भौगोलिक पहचान का वैश्विक तमगा हासिल है।

अनूठे जायकों की इस चुनिंदा फेहरिस्त की शोभा हैदराबाद का हलीम और पश्चिम बंगाल का रसगुल्ला जैसे व्यंजन पहले से बढ़ा रहे हैं। इंदौरी पोहा समेत पश्चिमी मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के चार लजीज व्यंजनों को जीआई चिन्ह दिलाने का बीड़ा इंदौर मिठाई-नमकीन निर्माता-विक्रेता व्यापारी संघ ने उठाया है।

कारोबारी संघ के सचिव अनुराग बोथरा ने "पीटीआई-भाषा" को बताया, "हम इंदौरी पोहा, लौंग की सेंव, खट्टा-मीठा मिक्सचर (एक तरह का नमकीन उत्पाद) और दूध से बनने वाली शिकंजी को जीआई चिन्ह दिलाने के लिये इनके स्थानीय इतिहास से जुड़े दस्तावेज जमा कर रहे हैं। इसके बाद जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री के सामने औपचारिक अर्जी पेश कर चारों व्यंजनों के लिये भौगोलिक पहचान के इस वैश्विक तमगे का दावा किया जायेगा।"

उन्होंने बताया, "इंदौर के पोहे के दुनिया भर में कद्रदान हैं, भले ही वह आम आदमी हो या कोई खास हस्ती। हमारे पास बरसों पुरानी ऐसी तस्वीर है, जिसमें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इंदौरी पोहे का लुत्फ लेते नजर आ रहे हैं। मशहूर अदाकार अमिताभ बच्चन भी इंदौरी पोहे की लज्जत का अलग-अलग मौकों पर जिक्र कर चुके हैं।"

बहरहाल, जानकारों का कहना है कि किसी भी व्यंजन पर जीआई चिन्ह का दावा साबित करना आसान नहीं होता। पहचान के इस प्रतिष्ठित तमगे को हासिल करने के लिये आवेदनकर्ता को लम्बी प्रक्रिया से गुजरना होता है। इस दौरान उसे जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री के सामने पुख्ता दस्तावेजी सबूत पेश करने होते हैं कि संबंधित पकवान का नुस्खा किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में खोजा गया था तथा व्यंजन को इस इलाके में एक जमाने से पकाया और खाया जा रहा है।

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केंद्र सरकार का सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) विकास संस्थान, इंदौरी पोहा समेत चारों मालवी व्यंजनों को जीआई तमगा दिलाने में इंदौर मिठाई-नमकीन निर्माता-विक्रेता व्यापारी संघ की मदद कर रहा है। इस संस्थान की इंदौर इकाई के सहायक निदेशक निलेश त्रिवेदी ने कहा, "जीआई चिन्ह मिलने के बाद चारों व्यंजनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबारी पहचान हासिल होगी। उत्पादकों या निर्माताओं को इस खास चिन्ह से न केवल उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग में मदद मिलेगी, बल्कि नक्कालों के खिलाफ उन्हें पुख्ता कानूनी संरक्षण भी प्राप्त होगा।"

मध्यप्रदेश से निर्यात को बढ़ावा देने के उपायों पर केंद्रित भारतीय निर्यात-आयात बैंक (एक्जिम बैंक) की पिछले साल आयी रिपोर्ट में भी कहा गया था कि प्रदेश सरकार को इंदौरी पोहे और अन्य पारम्परिक व्यंजनों को जीआई चिन्ह दिलाने की दिशा में प्रयास करने चाहिएं।

अप्रैल 2004 से लेकर अब तक जिन भारतीय पकवानों को खाद्य उत्पादों की श्रेणी में जीआई तमगा मिला है, उनमें धारवाड़ का पेड़ा (कर्नाटक), तिरुपति का लड्डू (आंध्र प्रदेश), बीकानेरी भुजिया (राजस्थान), हैदराबादी हलीम (तेलंगाना), जयनगर का मोआ (पश्चिम बंगाल), रतलामी सेंव (मध्यप्रदेश), बंदर लड्डू (आंध्र प्रदेश), वर्धमान का सीताभोग (पश्चिम बंगाल), वर्धमान का ही मिहिदाना (पश्चिम बंगाल) और बांग्लार रसगुल्ला (पश्चिम बंगाल) शामिल हैं।