यूनानी भोजन में पनीर, जैतून का तेल, सलाद और सब्जियों को अहमियत दी जाती है, शायद इसी कारण भारतीय भी अब यूनानी खानपान में दिलचस्पी ले रहे हैं। हाल के दिनों में यूनानी खाने में भारतीयों की दिलचस्पी आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है।

यह भूमध्यसागरीय भोजन की एक शाखा है, जिसे निर्विवाद रूप से सेहत के लिए सर्वश्रेष्ठ करार दिया जा चुका है। यूनानी भोजन में दही (योगर्ट), पनीर (विशेषकर बकरी के दूध से बना पनीर), जैतून का तेल, ताजा सब्जियों का सलाद, हरी पत्तियां, मछलियां तथा समुद्री जीव-जंतुओं को प्रमुख स्थान दिया जाता है। खाने के साथ मदिरा पान का चलन है। अंगूर और अन्य मौसमी तथा सूखे फल अनेक व्यंजनों की बुनियाद हैं।

युनानी खाने में मांस में बकरे का चलन है, जिसके कीमे से बनाया जाने वाला ‘मुसाका’ हमारे ‘ताश कबाब’ की तरह होता है। कीमे के साथ इसमें बैंगन की तली कतली भी रहती है, जिसे मुंह में डालते ही बंगाल के ‘बेगुन भाजा’ की याद दिलाता है।

अंगूर की पत्तियों में लपेटकर नन्हे चीनी ‘स्प्रिंग रोल्स’ सरीखे दिखने वाले ‘डोल्मा’ स्वादिष्ट चावलों से भरे रहते हैं। अवध के भरवां परवल ‘दुलमा’ या बंगाल के ‘दोलमा’ इन्हीं की संतान नजर आते हैं।

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मसालों के नाम पर ग्रीक अर्थात यूनानी खानपान में ताजा पुदीने, धनिए (सिलैंट्रो) या सूखी वनस्पतियों (ओरेगैनो जैसी हर्ब्स) का चलन है या काली मिर्च औेर लौंग के साथ जावित्री तथा जायफल। जबसे दक्षिणी अमेरिका से टमाटर तथा आलू का आयात हुआ, तभी से इसका इस्तेमाल भी खुले हाथ से होता रहा है। सब्जियों में भिंडी, बीन, शिमला मिर्च चाव से खाई जाती हैं।

मिठास के लिए शहद तथा खटास के लिए कागजी नींबू का इस्तेमाल आम है। जाहिर है कि यूनानी खाने के जायके भारतीय जुबान पर चढ़ेे जायकों से बहुत भिन्न नहीं। शायद यही कारण है कि इस देश में यह अपनी अलग पहचान बनाने में असमर्थ सिद्ध हुआ। हमें विदेशी विजेताओं के ‘अनोखे’ खाने ने अधिक आकर्षित किया।

दिलचस्प बात यह है कि सिकंदर की वापसी के बाद भी कुछ यूनानी उत्तर पश्चिमी सीमांत पर बसे रहे और एक छोटा यूनान वहां फलता-फूलता रहा। यह सुझाना तर्कसंगत है कि भारतीय यूनानी खानपान से कभी भी अपरिचित नहीं रहे हैं।