बॉलीवुड में श्रीदेवी जैसी अभिनेत्री कभी कोई दूसरी नहीं हो सकती जिसने कई सुपरहिट फिल्में ही नहीं दी बल्कि हर रोल के साथ न्याय भी किया। 13 अगस्त 1963 को जन्मी श्री देवी का निधन बाथटब में डूबने की वजह से हुआ।

2 जून 1996 को शादी कर श्रीदेवी और बोनी कपूर ने सबको चौंका दिया था। श्रीदेवी ने अपने फिल्मी सफर में लगभग हर तरह के रोल किये क्योंकि उनका यह शानदार सफर बचपन में शुरू जो हो गया था।

ठेठ दक्षिण के राज्य तमिलनाडु के शिवकाशी शहर में जन्मी श्रीदेवी के लिए ये सफर इतना आसान भी नहीं था पर उसने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से इसे कर दिखाया। दक्षिण में जन्म लिया तो उसने सारी दक्षिण भाषी फिल्मों में काम करके अपने अभिनय का लोहा भी मनवाया।

श्रीदेवी के विभिन्न अंदाज 
श्रीदेवी के विभिन्न अंदाज 

श्रीदेवी ने बगैर किसी गॅाडफादर के उस समय के सारे दिग्गज अभिनेताओं के साथ फिल्में की जिनमें कमल हासन से लेकर रजनीकांत और एन.टी.आर, कृष्णा, नागेश्वर राव, शोभन बाबू और उसके बाद चिरंजीवी, नागार्जुन और वेंकटेश के नाम प्रमुख रूप से लिये जा सकते हैं।

जैसा कि हर मेहनती और महत्वाकांक्षी के साथ होता है कि वह अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं होता और अधिक अच्छा काम करके ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहता है, तो श्रीदेवी ने भी यही किया।

वह अब दक्षिण की लगभग सभी भाषाओं में काम कर चुकी थी जिनमें तमिल, कन्नड़, मलयालम और तेलुगु शामिल है, तो इसके बाद उसने बॅालीवुड में कदम बढ़ाए और वहां भी सफलता मिलना इतना आसान नहीं था।

पति बोनी कपूर के साथ श्रीदेवी 
पति बोनी कपूर के साथ श्रीदेवी 

पर वो कहते हैं ना कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती तो श्रीदेवी ने कोशिश जारी रखी और इस बीच जो भी, जैसी भी फिल्में मिलती रही उसने उसमें काम किया जैसे जीतेंद्र के साथ कई फिल्में तो उसके मिथुन चक्रवर्ती के साथ भी कई फिल्में की।

इनमें से अधिकतर तेलुगु की रीमेक ही थी जिनमें श्रीदेवी ने ही काम किया था जैसे सोलवां सावन, तेलुगु फिल्म पदहारेल्ल वयसु का रीमेक थी तो सदमा, तेलुगु फिल्म वसंत कोकिला का जिस पर तमिल में भी फिल्म बन चुकी थी।

बेटी जाह्नवी के साथ श्रीदेवी 
बेटी जाह्नवी के साथ श्रीदेवी 

इसके बाद जस्टिस चौधरी बनी जो भी तेलुगु में बन चुकी थी, तो इस तरह लगातार काम करते हुए श्रीदेवी अपना अभिनय का सफर जारी रखे हिए थी और दिन ब दिन उनके अभिनय में निखार भी आता जा रहा था।

दक्षिण की होने के कारण उन्हें हिंदी भाषा सीखने और बोलने में भी दिक्कत आती तो वे लगातार उसे सीखते हुए आगे बढ़ रही थी। वहीं उनकी यह भी खास बात थी कि जब वो हिंदी फिल्मों में संघर्ष कर रही थी तब भी उनका तेलुगु व तमिल फिल्मों में काम करना बंद नहीं हुआ था।

पति बोनी कपूर व बेटियों के साथ श्रीदेवी 
पति बोनी कपूर व बेटियों के साथ श्रीदेवी 

वह हर जगह अपना बेस्ट दे रही थी, हम समझ सकते हैं कि उनके लिए भी यह सब आसान नहीं रहा होगा पर लगातार काम करते रहना जैसे उनकी आदत में शुमार हो चुका था।

फिर ऐसा भी दौर आया जब तेलुगु में चिरंजीवी के साथ जगदेक वीरुडु अतिलोक सुंदरी सुपरहिट रही तो हिंदी में भी मि.इंडिया व चालबाज और चांदनी जैसी फिल्मों ने उन्हें सुपरस्टार बनाया। यह वह दौर था जब वे दक्षिण और उत्तर भाषी फिल्मों को साथ-साथ संभाल रही थी।

श्रीदेवी 
श्रीदेवी 

यहां तेलुगु में वेंकटेश के साथ उन्हें लेकर रामगोपाल वर्मा ने क्षण क्षणम बनाई तो नागार्जुन के साथ उनकी गोविंदा गोविंदा आई जो बाद में हिंदी में ग्रेट बैंक रॅाबरी के नाम से डब हुई। कुछ सालों बाद यानि नगीना जैसी फिल्मों के रिलीज होने के बाद तो एक समय ऐसा भी आया जब श्रीदेवी को फिल्में हिट होने की वजह भी माना जाने लगा था।

उनकी जोड़ी अनिल कपूर के साथ तो जम ही गई थी पर इस दौर में उन्होंने बिग बी यानि अमिताभ बच्चन के साथ भी कई बेहतरीन फिल्मों में काम किया जिसमें खुदा गवाह के साथ आखरी रास्ता, इंकलाब तो शामिल थी और हाल ही में इंग्लिश विंग्लिश में भी उन्होंने श्रीदेवी के साथ छोटा सा रोल किया है।

खूबसूरत श्रीदेवी 
खूबसूरत श्रीदेवी 

फिर श्रीदेवी के जीवन में एक ऐसा भी मोड़ आया फिल्म जुदाई के बाद जब उन्होंने निर्माता बोनी कपूर से शादी करके घर बसा लिया और फिर बेटियों के जन्म के बाद अपने मातृत्व के सुख को भोगने और बेटियों की परवरिश के लिए फिल्मों से दूरी बना ली।

यानि श्रीदेवी को अपने जीवन की प्राथमिकताएं अच्छे से पता थी और वह अपने हर रोल को पूरी शिद्दत से निभाना जानती थी, फिर चाहे वह रोल फिल्मों में हो या असल जीवन में, तभी तो पूरी तरह से फिल्मों से जुड़ी श्रीदेवी ने घर व बच्चों को संभालने के लिए फिल्मों में काम करना पूरी तरह से बंद कर दिया।

यह वह समय था जब वे असल जिंदगी में मां का रोल निभा रही थी, पूरी शिद्दत से। तो जब बेटियां बड़ी हुई तो फिर उन्होंने लगभग बारह साल बाद फिर से कैमरे के सामने आने का निर्णय लिया और फिल्म थी निर्देशक गौरी शिंदे की इंग्लिश विंग्लिश।

इतने साल बाद भी फिल्म देखकर कहीं से नहीं लगता कि यह एक्ट्रेस इतने सालों से फिल्मों से दूर थी, फिल्म में उन्होंने गजब का अभिनय किया और फिर से फिल्म इंडस्ट्री में अपने अभिनय की धाक जमाई।

अलग-अलग रोल में श्रीदेवी का जलवा 
अलग-अलग रोल में श्रीदेवी का जलवा 

इस फिल्म को देखकर यही लगता है कि एक कलाकार भले ही कला से कितने समय के लिए भी दूर रहे पर जब वापसी करता है तो पूरी धमक के साथ क्योंकि वह सब कुछ भूल सकता है पर अपनी कला नहीं जो एक तरह से उसके अस्तित्व की पहचान होती है। यही बात श्रीदेवी ने साबित करके दिखाई।

श्रीदेवी को यह अच्छे से पता था कि सफलता का कोई शॅार्टकट नहीं होता इसीलिए वह अपने काम में किसी तरह की कोई कोताही नहीं बरतती थी, सिर्फ अभिनय की बात ही नहीं है बल्कि जब वे फिल्मों से दूर रही तब भी उन्होंने अपने आपको मेंटेन रखा, फिटनेस बरकरार रखी ताकि जब वापसी करे तो उसके लिए वे पहले से तैयार रहें।

फिर उनकी 300 वीं फिल्म मॅाम आई जो वैसे उनकी अंतिम फिल्म के रूप में ही याद रखी जाएगी। जैसे कि नाम से ही पता चलता है, इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसी मां का किरदार निभाया जो अपनी बेटी के लिए न्याय चाहती है और इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है।

उन्होंने यह रोल बेहतरीन तरीके से निभाया और इस बारे में उनका कहना था कि वे भी एक मां है तो मां के मन को बेहतर तरीके से समझ सकती हैं और इसके लिए अलग से उन्हें कुछ नहीं करना पड़ा।

तो ऐसी नेचुरल कलाकार थी श्रीदेवी। इस फिल्म के लिए उन्हें मरणोपरांत राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।श्रीदेवी ने पर्दे पर हर तरह के रोल बखूबी निभाए। वह एक चुलबुली लड़की का किरदार जहां अच्छे से अदा करती वहीं गंभीर रोल में भी पूरी जान लगा देती।

श्रीदेवी का निराला अंदाज
श्रीदेवी का निराला अंदाज

डांस में भी उनका कोई सानी नहीं था, वे चालबाज के गाने न जाने कहां से आई है न जाने कहां को जाएगी में जितना अच्छा डांस उन्होंने किया, वैसा ही चांदनी का मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियां है में भी डांस किया और लम्हे का मोरनी बागा में नाचे आधी रात में तो वैसे भी कोई भुला नहीं सकता।

तो यहां दक्षिण में भी चिरंजीवी जैसे डांसर के साथ उन्होंने पर्दे पर खूब ठुमके लगाए। फिल्म क्षण क्षणम में वेंकटेश के साथ जुंबारे गाने पर भी उनका डांस गजब का है। वैसे देखा जाए तो वे किसी भी कलाकार के सामने उन्नीस साबित नहीं होती थी।

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चाहे फिर सामने कमल हासन, रजनीकांत या फिर अमिताभ बच्चन ही क्यों न हो। उन्हें लेकर निर्देशक को कभी यह नहीं लगता था कि श्रीदेवी दिग्गज एक्टर के आगे टिक भी पाएगी या नहीं क्योंकि कैमरा के आन होते ही श्रीदेवी के अंदर का कलाकार भी जाग जाता था और फिर सामने कोई भी क्यों न रहे वे अपना बेस्ट ही देती थी।

ऐसी गजब कलाकार थी श्रीदेवी जो वैसे तो इस दुनिया से जा चुकी है पर अपनी कला के माध्यम से यानि अपने शानदार अभिनय के चलते हमेशा अपने चाहने वालों के दिलों में जीवित रहेगी क्योंकि कलाकार मर सकता है पर उसकी कला नहीं।

वह तो आने वाली पीढ़ियों तक को अपनी कला के माध्यम से प्रोत्साहित करता रहता है। यूं ही न जाने कितनी एक्ट्रेस श्रीदेवी को देखकर, उनसे सीखकर बड़ी हुई है और आगे भी न जाने ऐसी कितनी प्रतिभाओं को श्रीदेवी का अभिनय कौशल बहुत कुछ सिखाता रहेगा।