हैदराबाद : तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव ने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। चंद्रशेखर राव राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में गुरुवार को शपथ ली। केसीआर का यह लगातार दूसरा कार्यकाल होगा। राज्यपाल ई. एस. एल नरसिम्हन उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। केसीआर के अलावा महमूद अली ने भी उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है।

केसीआर के नाम से लोगों में लोकप्रिय चंद्रशेखर राव ने राजभवन में दोपहर बाद 1.25 बजे मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता ली। राज्यपाल ई. एस. एल नरसिम्हन उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई।

शपथ के पहले केसीआर और राज्यपाल
शपथ के पहले केसीआर और राज्यपाल

टीआरएस के नवनिर्वाचित विधायकों ने बुधवार को टीआरएस मुख्यालय तेलंगाना भवन में एक बैठक में केसीआर को अपना नेता चुना था।

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टीआरएस प्रमुख ने कल मीडिया से कहा कि वह अपने मंत्रिमंडल में सभी वर्गो को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश करेंगे।

राज्यपाल को बधाई देते हुए केसीआर
राज्यपाल को बधाई देते हुए केसीआर

टीआरएस नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात की और टीआरएस विधायक दल की बैठक में केसीआर को सर्वसम्मति से दल का नेता चुने जाने का प्रस्ताव उन्हें सौंपा।

शपथ लेते हुए महमूद अली
शपथ लेते हुए महमूद अली

राज्य आन्दोलन से सत्ता के शिखर तक अपनी जिद से पहुंचे के. चंद्रशेखर राव

श्री राव के उन राजनीतिक हस्तियों में से एक माना जाता है जो हमेशा अपने दम पर रिस्क लेते हुए फैसले लिया करते हैं और अपने फैसले को सच कर दिखाने का हुनर रखते हैं। लोग आज भी के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) के सही वक्त पर सही रास्ता चुनने के हुनर के कायल हैं और मानते हैं कि अपनी इसी खासियत से वह तेलंगाना की राजनीति में अपने संघर्ष से सत्ता के शीर्ष पर जा पहुंचे हैं।

ऐसा माना जाता है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को कई मौकों पर अहम फैसले बड़े सहज भाव से लेने वाले चतुर नेता के तौर पर देखा जाता है। उनका राजनीतिक जीवन कई अहम पड़ावों से गुजरा और सही समय पर सही रास्ता चुन लेने का उनका हुनर उन्हें नवगठित राज्य की सत्ता के शीर्ष तक ले गया।

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केसीआर का संक्षिप्त परिचय

तेलंगाना के मेडक जिले के चिंतमडका में 17 फरवरी 1954 को जन्मे चंद्रशेखर राव ने हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय से तेलुगु साहित्य में स्नातकोतर की डिग्री ली है। केसीआर ने 1970 में युवक कांग्रेस के सदस्य के तौर पर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की। 13 बरस तक कांग्रेस में रहने के बाद वह 1983 में तेलुगु देशम में शामिल हुए और 1985 से 1999 के बीच सिद्धिपेट से लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीते। वह आंध्र प्रदेश की एन. टी. की रामाराव सरकार में मंत्री बनाए गए।

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विधानसभा का उप सभापति

वर्ष 2000 में उन्हें आंध्र प्रदेश विधानसभा का उप सभापति बनाया गया। लेकिन उनके जीवन में वर्ष 2001 में एक और मोड़ आया, जब उन्होंने आंध्र प्रदेश विधानसभा के उपसभापति का पद ही नहीं छोड़ा तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) को भी अलविदा कह दिया। ऐसा भी कहा जाता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू से मतभेद और किसी बात पर नाराज होकर उन्होंने पार्टी छोड़ने और तेलंगाना राज्य के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया था।

ऐसे मिला राज्य

टीडीपी से अलग होकर तेलंगाना संघर्ष समिति का गठन करके तेलंगाना क्षेत्र को एक अलग राज्य बनाने के रास्ते पर निकल पड़े। तेलंगाना संघर्ष समिति ने धीरे धीरे अपनी जड़ें जमाना शुरू किया और साल 2004 में चंद्रशेखर करीमनगर लोकसभा क्षेत्र से न सिर्फ चुनाव जीते, बल्कि यूपीए-1 में केन्द्रीय मंत्री भी बनाए गए।

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हालांकि, अपनी धुन के पक्के केसीआर ने 2006 में यह कहकर मंत्री पद छोड़ दिया कि केन्द्र सरकार उनकी मांग को गंभीरता से नहीं ले रही है। उनके इन तमाम कदमों से वह तेलंगाना क्षेत्र में राजनीति की धुरी बन गए। अपनी मांग को लेकर केन्द्र सरकार पर लगातार दबाव बनाते हुए केसीआर ने नवंबर 2009 में एक बड़ा दांव खेला और तेलंगाना राज्य के गठन की मांग करते हुए आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनका यह पैंतरा काम कर गया और केन्द्रीय गृहमंत्री को कहना पड़ा कि तेलंगाना के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। केसीआर के नेतृत्व में तेलंगाना राष्ट्र समिति के लंबे संघर्ष के बाद 2014 में आखिरकार तेलंगाना का गठन हुआ।

नये तेलंगाना राज्य के गठन के बाद राज्य की 119 विधानसभा सीटों में से 63 पर विजय हासिल करके केसीआर सत्ता के गलियारों तक जा पहुंचे। इतना ही जब सरकार को अपने अंदाज से चलाना शुरू किया तो एक-एक करके कई दलों के जीते विधायक टीआएस के खेमे में जा खड़े हो गए। मौजूदा विधानसभा में इनके विधायकों की संख्या 90 तक जा पहुंची।

एक और जोखिम

केसीआर को राज्य पर शासन करते सवा चार बरस बीत चुके हैं और हाल ही में उन्होंने राज्य विधानसभा को भंग करने का ऐलान करके एक और बड़ा जोखिम लिया है। राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस फैसले की कई वजह हो सकती हैं। तेलंगाना में 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव प्रस्तावित थे।

चंद्रशेखर राव को शायद लगता हो कि लोकसभा के साथ चुनाव कराने पर राष्ट्रीय मुद्दे राज्य के मुद्दों पर हावी हो जाएंगे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान और राष्ट्रीय मुद्दों की आड़ में भाजपा को फायदा मिल सकता था। इस घोषणा की एक अन्य वजह कांग्रेस और टीडीपी के बीच कथित तौर पर कम हो रही दूरियां भी माना जा रहा है। हाल ही में मॉनसून सत्र में दोनों दलों ने जिस तरह से एक दूसरे का साथ दिया, उससे संकेत मिले हैं कि दोनों अगले चुनाव में आ रहे हैं।

इस साल के अंत में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में चुनाव होने वाले हैं और अगर इन राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा तो तेलंगाना में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता।

वजह कोई भी हो, लेकिन केसीआर ने समय से पहले राज्य विधानसभा को भंग करके जो दांव खेला है वह उनके बाकी फैसलों की तरह सही साबित होगा या नहीं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।