हिंदू धर्म में चार नवरात्रि होती है। जिसमें से दो है चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि और दो है गुप्त नवरात्रि। पहली गुप्त नवरात्रि माघ में आती है और दूसरी आषाढ़ में। तो माघ गुप्त नवरात्रि कल से यानी 25 जनवरी शनिवार से आरंभ हो चुकी है जो 3 फरवरी तक चलेगी जिसका पारण 4 फरवरी को किया जाएगा।

गुप्त नवरात्रि को आम नवरात्रि से अलग तरह से मनाया जाता है। इसमें मनोकामना और सिद्धियों के लिए गुप्त रूप से साधना की जाती है इसलिए इस गुप्त नवरात्रि कहते हैं।

गुप्त नवरात्रि की पूजा में रखें इन बातों का ध्यान

नाम के अनुसार इस गुप्त नवरात्रि में की जाने वाली शक्ति की साधना के बारे में जहां कम लोगों को ही जानकारी होती है, वहीं इससे जुड़ी साधना-आराधना को भी लोगों से गुप्त रखा जाता है। मान्यता है कि साधक जितनी गुप्त रूप से देवी की साधना करता है, उस पर भगवती की उतनी ही कृपा बरसती है।

सोशल मीडिया के सौजन्य से 
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आखिर क्यों होती है गुप्त रूप से पूजा

तांत्रिकों के लिए गुप्त नवरात्रि का महत्व बहुत अधिक होता है। इसमें गुप्त रूप से देवी मां की पूजा की जाती है। आषाढ़ मास के नवरात्रि में देवी की पूजा तंत्र-मंत्र के लिए की जाती है। देवी मां के हवन, पूजन आदि कर्म गुप्त रूप से रात के समय होती है इसलिए इसे गुप्त नवरात्रि कहते हैं।

ये है इस नवरात्रि की विशेषता

हम सब जानते हैं कि नवरात्रि में नौ देवियों की पूजा की जाती है पर इस गुप्त नवरात्रि की विशेषता यह है कि इसमें दस देवियों की पूजा होती है। जी हां, गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्या की पूजा होती है।

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तो आइये यहां जानते हैं इन दस महाविद्याओं के बारे में जिनकी गुप्त नवरात्रि में होती है पूजा ...

- इन दस महाविद्या में सबसे पहले आती है मां काली। मां काली को पहली विद्या और देवी दुर्गा का क्रोधित रूप माना जाता है। काली को समय और परिवर्तन की देवी माना जाता है। वह ब्रह्मांड के निर्माण से पहले ही समय की अध्यक्षता करती थीं। काली को भगवान शिव के अर्ध रूप में दर्शाया गया है। उसका निवास स्थान श्मशान है और उनके हथियार हैं कृपान (सिमितार) और त्रिशूल हैं। देवी महात्म्य के अनुसार देवी दुर्गा ने मां काली का रूप रक्तबीज नाम के राक्षस को हराने के लिए लिया था

- दूसरी महाविद्या है देवी तारा। तारा का अर्थ है चमकने वाला जिसे एक सुंदर लेकिन सदा आत्म-दहन के रूप में देखा जाता है इसलिए देवी तारा को जीवन के लिए प्रेरित करने वाली अस्वाभाविक भूख के उन्मूलन के रूप में माना जाता है। तारा वह देवी हैं जो परम ज्ञान प्रदान करती हैं और मुक्ति प्रदान करती हैं । मां तारा को नील सरस्वती के रूप में भी जाना जाता हैं। जिनके हाथ में हथियार के रूप में खड्ग, तलवार और कैंची की जोड़ी हैं।

-मां षोडशी को दस महाविद्याओं की तीसरी महाविद्या के रूप में जाना जाता है। देवी षोडशी को त्रिपुर सुंदरी के नाम से भी जाना जाता है। जैसा कि नाम से पता चलता है कि देवी षोडशी तीनों लोकों में सबसे सुंदर हैं। महाविद्याओं में वह देवी पार्वती का प्रतिनिधित्व करती हैं इसलिए इन्हें तांत्रिक पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। देवी षोडशी को ललिता और राजराजेश्वरी के रूप में भी जाना जाता है जिसका अर्थ है जो खेलती हैं और वह रानियों की रानी हैं।

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-देवी भुवनेश्वरी दस महाविद्याओं की देवियों में से चौथी देवी हैं। वह विश्व माँ के रूप में भी जानी जाती है और पूरे ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करती है। जैसा कि नाम से पता चलता है कि वह दुनिया की रानी है और पूरे ब्रह्मांड पर राज करती है। मां भुवनेश्वरी का विवरण त्रिपुर सुंदरी के रूप में किया जाता है। भुवनेश्वरी को आदि शक्ति के रूप में जाना जाता है। जिसका अर्थ है शक्ति के शुरुआती रूपों में से एक सगुण रूपों में देवी भुवनेश्वरी को देवी पार्वती के रूप में जाना जाता है।

-मां भैरवी दस महाविद्याओं में से पांचवीं देवी हैं। मां भैरवी देवियों के भयंकर और भयानक रूपों में से एक हैं लेकिन यह मां काली से अलग हैं। जो सर्वनाश से जुड़ा भगवान शिव के रूप जैसा ही उग्र रूप है। भैरवी को मुख्य रूप से दुर्गा सप्तशती में चंडी के रूप में देखा जाता है जिन्होंने चंद और मुंड का वध किया था। देवी भैरवी के दो अलग-अलग रूप हैं। जिनमें देवी भैरवी और देवी काली का की छवि देखने को मिलती है।

- मां छिन्नमस्ता को दस महाविद्याओं में से छठी विद्या माना जाता है और उन्हें स्वयंभू देवी के रूप में जाना जाता है। मां छिन्नमस्ता को प्रचंड चंडिका के नाम से भी जाना जाता है। देवी छिन्नमस्ता की उत्पत्ति के बारे में कई कथाएं हैं लेकिन ज्यादातर कथाओं के अनुसार माना जाता है कि देवी ने एक बड़ा और महान कार्य पूरा करने के लिए खुद को दोषी ठहराया था।

मां छिन्नमस्ता का रूप अत्यंत ही भयानक है। स्वयंभू देवी ने अपने एक हाथ में अपना सिर रखा हुआ है और दूसरे हाथ में खड्ग पकड़े हुए हैं।

-मां धूमावती दस महाविद्याओं की सातवीं देवी है। देवी धूमावती एक पुरानी विधवा हैं और अशुभ और अनाकर्षक मानी जाने वाली चीजों से जुड़ी हैं। वह हमेशा भूखी और प्यासी रहती हैं और हमेशा झगड़े वाली जगहों पर ही रहती हैं। इनकी तुलना अलक्ष्मी से की जाती है।

ये तीनों देवियां नकारात्मक गुणों का अवतार हैं लेकिन इनकी पूजा वर्ष के विशेष समय में पूजा की जाती है। प्राणतोषिनी तंत्र में वर्णित पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवी सती ने अपनी अत्यधिक भूख के कारण भगवान शिव को निगल लिया था। जिसके बाद भगवान शिव ने उसे अस्वीकार कर दिया और उन्हें विधवा का रूप धारण करने का शाप दिया।

-मां बगलामुखी को दस महाविद्याओं की आठवीं देवी माना जाता है। देवी बगलामुखी को दुश्मनों को नियंत्रित करने वाली देवी माना जाता है जो दुश्मनों को अपंग बना देती हैं। इसके साथ ही इन्हें स्तभन की देवी भी माना जाता है।

देवी बगलामुखी का रंग सुनहरा है और वह पीले कमलों से भरे अमृत के सागर के बीच एक स्वर्ण सिंहासन में विराजमान है। मां ने पीले वस्त्र धारण किए हैं और उनके सिर पर अर्धचंद्राकार चंद्रमा सुशोभित है।

-मां मातंगी दस महाविद्याओं की नवीं देवी मानी जाती हैं। इन्हें देवी सरस्वती की तरह ही भाषा, संगीत, ज्ञान और कलाओं को नियंत्रित करने वाली देवी माना जाता है। इसलिए देवी मातंगी को तांत्रिक सरस्वती के नाम से भी जाना जाता है।

देवी मातंगी का रंग हरा है। देवी मातंगी को चार भुजाओं के साथ दर्शाया गया है जिसमें वह एक हाथ में तलवार, दूसरे में हाथ में फंदा, तीसरे हाथ में अकुंश, चौथे हाथ में, चौथे हाथ में दंड देने वाला हथियार है।

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-मां कमला को दस महाविद्याओं में से दसवीं विद्या माना जाता है। देवी कमला को देवी का सबसे सर्वोच्च रूप माना जाता है जो बहुत सुंदर है। उनकी न केवल देवी लक्ष्मी के साथ तुलना की जाती है, बल्कि उन्हें देवी लक्ष्मी के रूप में भी माना जाता है।

मां कमला को तांत्रिक लक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है। मां कमला के रूप में देवी समृद्धि और धन, उर्वरता , फसलों और अच्छे भाग्य की देवी मानी जाती है। इसलिए मां कमला को धन और धान्य की देवी कहा जाता है।