हम सब जानते ही हैं कि हिंदू धर्म में एकादशी का बड़ा महत्व है और माना जाता है कि एकादशी का व्रत करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। हर माह में दो एकादशी होती है वहीं कुछ एकादशी के व्रत का खास महत्व भी होता है।

माघ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन तिल से पूजन किया जाता है, तिल का दान दिया जाता है साथ ही भगवान को तिल से बने व्यंजन का ही भोग भी लगाया जाता है।

एकादशी का दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु को समर्पित होता है और खास तौर पर षटतिला एकादशी पर तो भगवान विष्णु की पूजा काले तिल से की जाती है और इससे भक्त पर भगवान की कृपा बरसती है।

षटतिला एकादशी के दिन काली गाय और तिल के दान का विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार, षटतिला एकादशी के दिन व्यक्ति अगर तिल का प्रयोग 6 प्रकार से करे तो पाप कर्मों से मुक्त होकर हजारों वर्षों तक परलोक में सुख भोग प्राप्त करता है। इस के दिन साधक को प्रात:काल स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। भगवान विष्णु को तिल और उड़द मिश्रित खिचड़ी का भोग लगाना चाहिए।

सोशल मीडिया के सौजन्य से 
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ये है षटतिला एकादशी का महत्व

षटतिला एकादशी व्रत में तिल का खास महत्‍व बताया गया है। स्‍नान, दान, भोजन, तर्पण व प्रसाद सभी में तिल का उपयोग किया जाता है। तिल स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का तर्पण, तिल का भोजन और तिल का दान के कारण यह षटतिला एकादशी कहलाती है।

पुराणों में बताया गया है कि जितना पुण्य कन्यादान, हजारों वर्षों की तपस्या और स्वर्ण दान करने के बाद मिलता है, उससे कहीं ज्यादा फल एकमात्र षटतिला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को मिल जाता है।

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ऐसे करें षटतिला एकादशी पर पूजा

- जो लोग षटतिला एकादशी का व्रत रखना चाहते हैं। उन्हें प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर नित्यक्रिया के बाद तिल का उबटन लगाकर पानी में तिल मिलाकर स्नान करना चाहिए।

- इसके बाद भगवान श्री कृष्ण को तिल का प्रसाद अर्पित करें और तिल से ही हवन करें।

- इस एकादशी के व्रत में तिल का दान करना उत्तम बताया गया है। जल पीने की इच्छा हो तो जल में तिल मिलाकर पिएं।

- एकादशी के दिन शाम के समय भगवान विष्णु का पूजन कर तुलसी के पौधे के पास एक दीपक जलाएं। अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करें।

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- जो लोग व्रत नहीं कर सकते हैं उनके लिए जितना संभव हो तिल का उपयोग करें। तिल खाएं, तिल मिला हुआ पानी पिएं। तिल का उबटन लगाकर स्नान करें और तिल का दान भी करें। अगर इतना सबकुछ करना संभव नहीं हो तो सिर्फ तिल का उच्चारण ही करें तो भी पाप कर्मों के अशुभ प्रभाव में कमी आएगी।