जानें क्यों और कैसे मनाया जाता है मकर संक्रांति का पर्व, स्नान-दान का है विशेष महत्व  

सोशल मीडिया के सौजन्य से  - Sakshi Samachar

हम सब जानते ही हैं कि हर साल मकर संक्रांति का पर्व जनवरी की 14 या फिर 15 तारीख को मनाया जाता है। वहीं ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तब मकर संक्रांति का पावन पर्व मनाया जाता है।

साल 2020 में 14 जनवरी की रात्रि में सूर्य उत्तरायण होंगे और 15 जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा। मकर संक्रांति महज़ एक त्यौहार भर नहीं है बल्कि सांस्कृतिक महत्व के साथ-साथ इस पर्व का संबंध हमारी प्रकृति से भी है तभी तो साल का ये पहला त्यौहार काफी खास माना जाता है।

यहां सवाल उठता है कि आखिर मकर संक्रांति का त्योहार क्यों और कैसे मनाया जाता है।

तो आइए यहां जानते हैं कि मकर संक्रांति क्यों और कैसे मनाया जाता है ...

- मकर संक्रांति मनाने का सबसे कारण यही है कि इस दिन सूर्य धनु राशि छोड़कर मकर राशि में प्रवेश कर जाता है सिर्फ यही नहीं मकर राशि में प्रवेश करने के साथ-साथ सूर्य उत्तरायण भी होने लगता है। कहते हैं ये बेहद ही शुभ काल होता है।

-मान्यता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी छोड़कर उनके घर शनिदेव से मिलने गए थे। यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन को सुख और समृद्धि से भी जोड़ा जाता है।

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-मकर संक्रांति का वसंत ऋतु से भी गहरा संबंध है। दरअसल माना जाता है। इस दिन से ही वसंत ऋतु का आगाज़ हो जाता है। ठंड ऋतु में मौसम बदलने लगता है। दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को नई ऋतु और मौसम के स्वागत के तौर पर भी मनाया जाता है।

- मकर संक्रांति पर्व का किसानों से भी खास संबंध है। कहा जाता है कि इस वक्त किसानों की फसल पककर तैयार हो जाती है। लोग अपनी नई और साल की पहली फसल को भगवान को अर्पित करने के लिहाज़ से भी इस पर्व को मनाते हैं। हर राज्य में पर्व का नाम अलग अलग है लेकिन हर जगह इसे मनाने की पीछे परंपरा यही जुड़ी है।

उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है। जबकि गुजरात और राजस्थान में इसे उत्तरायण पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान यहां पतंगबाज़ी का उत्सव होता है।

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वही आंध्रप्रदेश में इसे संक्रांति के नाम से जाना जाता है जो तीन दिन तक मनाया जाता है। दक्षिण के तमिलनाडु में ये पर्व पोंगल कहलाता है जो 4 दिनों तक चलता है।

पंजाब में इसे लोहड़ी कहते हैं जो 13 जनवरी को हर साल मनाई जाती है।

- मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर लौटता है इसलिए भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पूजन करके घी, तिल, कंबल और खिचड़ी का दान किया जाता है।

-माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम प्रयाग में सभी देवी-देवता अपना रूप बदलकर स्नान करने आते हैं। यही कारण है कि इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है।

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- महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का दिन ही चुना था।

- मकर संक्रांति के दिन ही भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर गंगा कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थी।

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-तमिलनाडु में मकर संक्रांति के पर्व को चार दिनों तक मनाया जाता है। पहला दिन भोगी-पोंगल, दूसरा दिन सूर्य-पोंगल, तीसरा दिन मट्टू-पोंगल और चौथा दिन कन्‍या-पोंगल के रूप में मनाते हैं। यहां दिनों के अनुसार पूजा और अर्चना की जाती है।

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