हिंदू धर्म में एकादशी का बड़ा महत्व है और ये महीने में दो बार आती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा व व्रत किया जाता है। पर मार्गशीर्ष मास में आने वाली उत्पन्ना एकादशी का सबसे ज्यादा महत्व है क्योंकि इसी दिन एकादशी माता का जन्म हुआ था। इसीलिए इस एकादशी का नाम उत्पन्ना पड़ा।

एकादशी माता को भगवान विष्णु की शक्ति ही माना जाता है। कहते हैं कि इस दिन मां एकादशी ने उत्‍पन्न होकर अतिबलशाली और अत्‍याचारी राक्षस मुर का वध किया था। मान्‍यता के अनुसार इस दिन स्‍वयं भगवान विष्‍णु ने माता एकादशी को आशीर्वाद देते हुए इस व्रत को पूज्‍यनीय बताया था।

माना जाता है कि इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से सभी पापों का नाश हो जाता है। इस बार उत्पन्ना एकादशी 22 नवंबर 2019 शुक्रवार को है।

उत्‍पन्ना एकादशी की तिथि और शुभ मुहूर्त

उत्‍पन्ना एकादशी की तिथि: 22 नवंबर 2019

एकादशी तिथि प्रारंभ: 22 नवंबर 2019 को सुबह 09 बजकर 01 मिनट से

एकादशी तिथि समाप्‍त: 23 नवंबर 2019 को सुबह 06 बजकर 24 मिनट तक

पारण का समय: 23 नवंबर 2019 को दोपहर 01 बजकर 10 मिनट से दोपहर 03 बजकर 15 मिनट तक

भगवान विष्णु 
भगवान विष्णु 

ये है उत्पन्ना एकादशी का महत्व

हिन्‍दू धर्म को मानने वालों में उत्‍पन्ना एकादशी का खास महत्‍व है। मान्‍यता है कि इस व्रत को करने से मनुष्‍य के सभी पाप नष्‍ट हो जाते हैं। यही नहीं जो लोग एकादशी का व्रत करने के इच्‍छुक हैं उन्‍हें उत्‍पन्ना एकादशी से ही व्रत की शुरुआत करनी चाहिए।

आपको बता दें कि साल में 24 एकादशियां पड़ती हैं और हर महीने दो एकदाशी आती हैं। कहा जाता है कि उत्‍पन्ना एकादशी के दिन भगवान विष्‍णु ने मुरसुरा नाम के असुर का वध किया था। श्री हरि विष्‍णु की जीत की खुशी में भी इस एकादशी को मनाया जाता है। इस एकादशी में भगवान विष्‍णु और माता एकादशी का विधि-विधान से पूजन किया जाता है।

ऐसे करें उत्‍पन्ना एकादशी की पूजा

- इस दिन सुबह उठकर स्‍नान करने के बाद स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण कर भगवान श्रीकृष्‍ण का स्‍मरण करते हुए पूरे घर में गंगाजल छिड़कें।

- विघ्‍नहर्ता भगवान गणेश और भगवान श्रीकृष्‍ण की मूर्ति या तस्‍वीर सामने रखें।

- सबसे पहले भगवान गणेश को तुलसी की मंजरियां अर्पित करें।

- इसके बाद विष्‍णु जी को धूप-दीप दिखाकर रोली और अक्षत चढ़ाएं।

- पूजा पाठ करने के बाद व्रत-कथा सुननी चाहिए। इसके बाद आरती कर प्रसाद बांटें।

- व्रत एकदाशी के अलग दिन सूर्योदय के बाद खोलना चाहिए।

- इस दिन अन्‍न ग्रहण नहीं करना चाहिए।

- इस दिन गरीब और जरूरतमंदों को यथाशक्ति दान देना चाहिए।

उत्पन्ना एकादशी की पूजा 
उत्पन्ना एकादशी की पूजा 

उत्‍पन्ना एकादशी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार सतयुग में मुर नाम का दैत्य उत्पन्न हुआ। उस प्रचंड दैत्य ने इंद्र, आदित्य, वसु, वायु, अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित करके भगा दिया। तब इंद्र सहित सभी देवताओं ने भयभीत होकर भगवान शिव से सारा वृत्तांत कहा ।

तब भगवान शिव ने कहा- "हे देवताओं! तीनों लोकों के स्वामी, भक्तों के दु:खों का नाश करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ। वे ही तुम्हारे दु:खों को दूर कर सकते हैं." शिव जी के ऐसे वचन सुनकर सभी देवता क्षीरसागर में पहुंचे।

भगवान विष्णु से सारा वृतांत कह सुनाया। फिर भगवान सहित सभी देवताओं ने चंद्रावती नगरी की ओर प्रस्थान किया। उस समय दैत्य मुर सेना सहित युद्ध भूमि में गरज रहा था। उसकी भयानक गर्जना सुनकर सभी देवता भय के मारे चारों दिशाओं में भागने लगे। जब स्वयं भगवान रणभूमि में आए तो दैत्य उन पर भी अस्त्र, शस्त्र, आयुध लेकर दौड़े।

भगवान ने उन्हें सर्प के समान अपने बांणों से बींध डाला। बहुत से दैत्य मारे गए। केवल मुर बचा रहा। वह अविचल भाव से भगवान के साथ युद्ध करता रहा। दोनों के बीच मल्लयुद्ध भी हुआ।

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10 हजार वर्ष तक उनका युद्ध चलता रहा किंतु मुर नहीं हारा। थककर भगवान बद्रिकाश्रम चले गए। वहां हेमवती नामक सुंदर गुफा थी, उसमें विश्राम करने के लिए भगवान उसके अंदर प्रवेश कर गए। विष्णु भगवान वहां योगनिद्रा की गोद में सो गए।

मुर भी पीछे-पीछे आ गया और भगवान को सोया देखकर मारने को उद्यत हुआ तभी भगवान के शरीर से उज्ज्वल, कांतिमय रूप वाली देवी प्रकट हुई। देवी ने राक्षस मुर को ललकारा, युद्ध किया और उसे तत्काल मौत के घाट उतार दिया।

श्री हरि जब योगनिद्रा की गोद से उठे, तो सब बातों को जानकर उस देवी से कहा कि आपका जन्म एकादशी के दिन हुआ है, अत: आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजित होंगी। आपके भक्त वही होंगे, जो मेरे भक्त हैं।