हैदराबाद : उर्दू के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का आज पुण्यतिथि है। उनकी शायरी में अहसास, बदलाव, प्रेम और सुकुन सब कुछ था। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कलम में वो ख़ासियत थी जो विरले ही देखने को मिलती है। उनकी कलम में इंकलाबी और रूमानी दोनों ही तासीर हैं। फैज का जन्म 1911 को सियालकोट पाकिस्तान में हुआ था। दरअसल उस समय पाकिस्तान का उदय नहीं हुआ था। फैज पाकिस्तान के ऐसे शायर हुए जो पाकिस्तान के साथ-साथ भारत में भी खूब पढ़े गये और गाये भी गए। आज ही के दिन वर्ष 1984 में लाहौर पाकिस्तान में उनका निधन हुआ था।

इस मौके पर पेश है फैज अहमद फैज के मशहूर गजलें.......

ग़ज़ल

1. आप की याद आती रही रात भर'

चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर

गाह जलती हुई गाह बुझती हुई

शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन

कोई तस्वीर गाती रही रात भर

फिर सबा साया-ए-शाख़-ए-गुल के तले

कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर

हर सदा पर बुलाती रही रात भर

एक उम्मीद से दिल बहलता रहा

इक तमन्ना सताती रही रात भर

2.

क़र्ज़-ए-निगाह-ए-यार अदा कर चुके हैं हम

सब कुछ निसार-ए-राह-ए-वफ़ा कर चुके हैं हम

कुछ इम्तिहान-ए-दस्त-ए-जफ़ा कर चुके हैं हम

कुछ उन की दस्तरस का पता कर चुके हैं हम

अब एहतियात की कोई सूरत नहीं रही

क़ातिल से रस्म-ओ-राह सिवा कर चुके हैं हम

देखें है कौन कौन ज़रूरत नहीं रही

कू-ए-सितम में सब को ख़फ़ा कर चुके हैं हम

अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें

रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम

उन की नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंग

जितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम

कुछ अपने दिल की ख़ू का भी शुक्राना चाहिए

सौ बार उन की ख़ू का गिला कर चुके हैं हम

3.

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी

सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

कब जान लहू होगी कब अश्क गुहर होगा

किस दिन तिरी सुनवाई ऐ दीदा-ए-तर होगी

कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ाना

कब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी

वाइ'ज़ है न ज़ाहिद है नासेह है न क़ातिल है

अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी

कब तक अभी रह देखें ऐ क़ामत-ए-जानाना

कब हश्र मुअ'य्यन है तुझ को तो ख़बर होगी

4.

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं

किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं

हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं

तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं

हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है

जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं

सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन

तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं

वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी

फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं

दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है

तो 'फ़ैज़' दिल में सितारे उतरने लगते हैं

5.

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में

नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वज़ू ही सही

किसी तरह तो जमे बज़्म मय-कदे वालो

नहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हाव-हू ही सही

गर इंतिज़ार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल

किसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ़्तुगू ही सही

दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई

6.

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है, यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे, ग़मगुसार चले

जो हम पे गुज़री सो गुज़री है शब-ए-हिज़्रां
हमारे अश्क़ तेरी आक़बत संवार चले

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूं की तलब
गिरह में लेके गरेबां का तार-तार चले

मुक़ाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जंचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले