मार्गशीर्ष माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी को काल भैरव अष्टमी मनाई जाती है। काल भैरव भगवान शिव के क्रोधाग्नि का ही विग्रह रूप है। भैरव अष्टमी पर मध्याह्न में भगवान शिव के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। इस बार काल भैरव अष्टमी 19 नवंबर मंगलवार को मनाई जाएगी। इस दिन विधि-विधान से भैरव बाबा की पूजा करनी चाहिए जिससे जीवन में किसी तरह का कोई भय नहीं रहता।

काल भैरव को शिव का पांचवां अवतार माना जाता है। इनके दो रूप है पहला बटुक भैरव जो भक्तों को अभय देने वाले सौम्य रूप में प्रसिद्ध है तो वहीं काल भैरव आपराधिक प्रवृतियों पर नियंत्रण करने वाले भयंकर दंडनायक है।इनकी शक्ति का नाम है 'भैरवी गिरिजा ', जो अपने उपासकों की अभीष्ट दायिनी हैं ।

काल भैरव की पूजा आराधना से घर में नकारात्मक ऊर्जा, जादू-टोने तथा भूत-प्रेत आदि से किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता।

शिव पुराण में कहा गया है कि

''भैरवः पूर्णरूपोहि शंकरस्य परात्मनः।

मूढास्तेवै न जानन्ति मोहितारूशिवमायया।''

अर्थात भैरव परमात्मा शंकर के ही रूप हैं लेकिन अज्ञानी मनुष्य शिव की माया से ही मोहित रहते हैं।

कहते हैं कि जो शिव भक्त शंकर के भैरव रूप की आराधना नित्य प्रति करता है उसके लाखों जन्मों में किए हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। इनके स्मरण और दर्शन मात्र से ही प्राणी निर्मल हो जाता है। इनके भक्तों का अनिष्ट करने वालों को तीनों लोकों में कोई शरण नहीं दे सकता।

काल भी इनसे भयभीत रहता है इसलिए इन्हें काल भैरव एवं हाथ में त्रिशूल,तलवार और डंडा होने के कारण इन्हें दंडपाणि भी कहा जाता है।

काशी के कोतवाल काल भैरव 
काशी के कोतवाल काल भैरव 

भैरव को प्रसन्न करने के लिए उड़द की दाल या इससे निर्मित मिष्ठान, दूध-मेवा का भोग लगाया जाता है ,चमेली का पुष्प इनको अतिप्रिय है। कालिका पुराण के अनुसार भैरव जी का वाहन श्वान है इसलिए विशेष रूप से इस दिन काले कुत्ते को मीठी चीजें खिलाना बड़ा शुभ माना जाता है।

ऐसे बनें काल भैरव काशी के कोतवाल

हम सब जानते ही हैं कि काल भैरव काशी के कोतवाल है और जो भी काशी आकर इनके दर्शन नहीं करता उसे काशी विश्वनाथ के दर्शन का फल भी नहीं मिलता। इनके दर्शनों को अनिवार्य माना जाता है।

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यहां सवाल उठता है कि आखिर काल भैरव कैसे बनें काशी के कोतवाल। तो आइये यहां जानते हैं इससे जुड़ी रोचक कथा ...

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्माजी और विष्णुजी के बीच यह चर्चा छिड़ गई कि दोनों में बड़ा कौन है? चर्चा के बीच शिवजी का जिक्र आने पर ब्रह्माजी के पांचवें मुख ने शिव की आलोचना कर दी, जिससे शिव बहुत क्रुद्ध हुए।

काल भैरव अष्टमी पर होती है काल भैरव की पूजा
काल भैरव अष्टमी पर होती है काल भैरव की पूजा

उसी क्षण भगवान शिव के क्रोध से काल भैरव का जन्म हुआ। इसी कारण काल भैरव को शिव का अंश कहा जाता है। काल भैरव ने शिवजी की आलोचना करनेवाले ब्रह्माजी के पांचवें मुख को अपने नाखूनों से काट दिया।

अब यह मुख उनके हाथ से अलग नहीं हो रहा था। तभी शिवजी प्रकट हुए। उन्‍होंने भैरव से कहा कि अब तुम्‍हें ब्रह्म हत्‍या का दोष लग चुका है और इसकी सजा यह है कि तुम्‍हें एक सामान्‍य व्‍यक्ति की तरह तीनों लोकों का भ्रमण करना होगा। जिस स्‍थान पर यह शीश तुम्‍हारे हाथ से छूट जाएगा, वहीं पर तुम इस पाप से मुक्‍त हो जाओगे।

शिवजी की आज्ञा से काल भैरव तीनों लोकों की यात्रा पर चल दिए। उनके जाते ही शिवजी की प्रेरणा से एक कन्या प्रकट हुई। एक तेजस्‍वी कन्‍या, जो अपनी लंबी जीभ से कटोरे में रक्‍तपान कर रही थी। यह कन्‍या कोई और नहीं ब्रह्म हत्‍या थी। इसे शिवजी ने भैरव के पीछे छोड़ दिया था।

काशी शिव की नगरी है, जहां वह बाबा विश्वनाथ के रूप में नगर के राजा के तौर पर पूजे जाते हैं। यहां गंगा के तट पर पहुंचते ही भैरव बाबा के हाथ से ब्रह्माजी का शीश अलग हो गया और भैरव बाबा को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली।

काल भैरव के पाप मुक्त होते ही वहां शिवजी प्रकट हुए और उन्होंने काल भैरव को वहीं रहकर तप करने का आदेश दिया।

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शिवजी ने काल भैरव को आशीर्वाद दिया कि तुम इस नगर के कोतवाल कहलाओगे और इसी रूप में तुम्हारी युगों-युगों तक पूजा होगी। शिव प्रेरणा से जिस स्थान पर काल भैरव रह गए, बाद में वहां काल भैरव का मंदिर स्‍थापित कर दिया गया।

काशी में मान्‍यता है कि भक्‍तों को बाबा विश्वनाथ के बाद काल भैरव के दर्शन करना अनिवार्य है। अन्‍यथा बाबा विश्वनाथ के दर्शन भी अधूरे माने जाते हैं।

तो इस तरह बाबा विश्वनाथ के आशीर्वाद से काल भैरव बन गए काशी के कोतवाल जिनके दर्शन करने से ही बाबा विश्वनाथ के दर्शनों का फल मिलता है।