वृश्चिक संक्रांति: रविवार को होने से बढ़ गया संक्रांति का महत्व, यूं करेंगे सूर्य पूजा तो मिलेगा शुभ फल 

वृश्चिक संक्रांति का महत्व  - Sakshi Samachar

जब सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश होता है तो उसे संक्रांति कहते हैं। तो अब 16 नवंबर की रात 12 बजे के बाद जब 17 तारीख आ जाएगी तभी सूर्य तुला को छोड़कर वृश्चिक राशि में प्रवेश करेंगे।

सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश कर रहे हैं इसलिए इसे वृश्चिक संक्रांति कहा जाता है। सूर्य हर राशि में एक महीने तक रहता है और इसके बाद फिर दूसरी राशि में जाता है। बारह राशियों में एक-एक महीने रहते हुए साल बीत जाता है।

संक्रांति को बहुत ही पवित्र दिनों में से एक माना जाता है। इसलिए इसे हिन्दू धर्म में पर्व भी कहा गया है। मकर संक्रांति को तो भव्य रूप से मनाया ही जाता है वहीं अन्य संक्रांति पर भी सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन स्नान-दान का विशेष महत्व होता है।

ये है वृश्चिक संक्रांति का शुभ मुहूर्त

17 नवंबर 2019 - सूर्य का तुला से वृश्चिक राशि में गमन

वृश्चिक संक्रांति पुण्यकाल - सुबह 6:48 से दोपहर 12:12 तक

वृश्चिक संक्रांति महापुण्यकाल - सुबह 6:48 से सुबह 8:36 तक

ये है वृश्चिक संक्रांति का महत्व

इस बार वृश्चिक संक्रांति रविवार को पड़ रही है इस वजह से इसका महत्व और बढ़ गया है। यह संक्रांति धार्मिक व्यक्तियों, वित्तीय कर्मचारियों, छात्रों व शिक्षकों के लिए बहुत शुभ मानी जाती है। वृश्चिक संक्रांति के विशिष्ट पूजन व उपाय से धन से जुडी समस्याओं का निदान होता है और छात्रों को परीक्षा व करियर में सफलता मिलती है।

- संक्रांति के दिन दान-पुण्य करने का बड़ा महत्व होता है। इसलिए बहुत से लोग इस दिन भी वस्तुएं और खान पान की चीजें गरीबों में दान करते है।

भगवान सूर्य 

- वृश्चिक संक्रांति के दिन स्नान, दान का खास महत्व होता है। इस दिन श्राद्ध और पितृ तर्पण का भी खास महत्व होता है।

- वृश्चिक संक्रांति के दिन की 16 घड़ियों को बहुत शुभ माना जाता है। इस दौरान दान करने से पुण्य प्राप्ति होती है। यह दान संक्रांति काल में करना अच्छा माना जाता है।

मान्यताओं के अनुसार वृश्चिक संक्रांति में ब्राह्मण को गाय दान करने का खास महत्व होता है।

वृश्चिक संक्रांति पर ऐसे करें पूजा

- इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिए।

- पानी में लाल चंदन मिलाकर तांबे के लोटे से सूर्य को जल चढ़ाएं। इसके साथ ही रोली, हल्दी व सिंदूर मिश्रित जल से सूर्यदेव को अर्घ्य दें।

सूर्य देव की पूजा का महत्व 

- लाल दीपक जलाना चाहिए यानी घी में लाल चंदन मिलाकर दीपक लगाएं। सूर्य देव को लाल फूल चढ़ाएं।

- गुग्गल की धूप करें, रोली, केसर, सिंदूर आदि चढ़ाना चाहिए।

इसे भी पढ़ें :

सूर्यदेव तुला से वृश्चिक राशि में करेंगे प्रवेश, जानें बारह राशियों पर कैसा रहेगा इसका असर

कालभैरव अष्टमी 2019: जानें आखिर कैसे बनें भैरव बाबा काशी के कोतवाल, ये है कथा

- सूर्यदेव को गुड़ से बने हलवे का भोग लगाएं और लाल चंदन की माला से ॐ भास्कराय नमः मंत्र का जाप करें।

- पूजन के बाद नैवेद्य लगाएं और उसे प्रसाद के रूप में बांट दें।

Advertisement
Back to Top