11 नवंबर को है वैकुंठ चतुर्दशी, यूं शुभ मुहूर्त में करें भगवान शिव और विष्णु की पूजा, जानें महत्व व कथा  

भगवान शिव ने दिया था विष्णु को सुदर्शन चक्र  - Sakshi Samachar

हिंदू धर्म में कार्तिक माह का बड़ा महत्व होता है। इस महीने को भगवान विष्णु का प्रिय मास माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने तुलसी पूजन, दीप दान, गंगा स्नान, दान-पुण्य जैसे कर्म करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और उस पर लक्ष्मी-नारायण की कृपा होती है।

कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को वैकुंठ चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन व्रत रखने के साथ ही भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा का विधान है।

इस बार वैकुंठ चतुर्दशी 11 नवंबर सोमवार को है। मान्यता है कि जो भी मनुष्य वैकुंठ चतुर्दशी को शिव और नारायण की पूजा करता है उसके सारे पाप कट जाते हैं।

वैकुंठ चतुर्दशी पूजा विधि

- वैकुंठ चतुर्दशी के दिन सुबह जल्दी स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए।

- इस दिन घर में चौकी पर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।

- इसके बाद भगवान विष्णु को कमल के 1000 फूल अर्पित करने चाहिए। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो आप भगवान को एक ही कमल का फूल अर्पित करें।

- इसके बाद उन्हें तुलसी दल भी अर्पित करें। तुलसी दल अर्पित करने के बाद भगवान विष्णु को चंदन का तिलक करें।

- इसके बाद भगवान विष्णु के मंत्र और श्री सूक्त का पाठ करें। - इसके बाद बैकुंठ चतुर्दशी की कथा अवश्य सुनें।

- कथा सुनने के बाद भगवान विष्णु की धूप व दीप से आरती उतारें।

- आरती उतारने के बाद भगवान विष्णु को खिचड़ी, घी और आम के अचार का भोग लगाएं।

- इसके बाद यह खिचड़ी, घी और आम का आचार प्रसाद के रूप में स्वंय भी ग्रहण करें और परिवार के लोगों को भी दें।

- इसके बाद किसी सरोवर, नदी या तट पर 14 दीपक अवश्य जलाएं।

भगवान विष्णु और भोलेनाथ 

वैकुंठ चतुर्दशी 2019 शुभ मुहूर्त

वैकुण्ठ चतुर्दशी निशिथकाल - रात 11 बजकर 39 मिनट से 12 बजकर 32 मिनट तक

(11 नवम्बर 2019) चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ - शाम 4 बजकर 33 मिनट से (10 नवंबर 2019)

चतुर्दशी तिथि समाप्त - अगले दिन शाम 6 बजकर 2 मिनट तक (11 नवंबर 2019)

वैकुंठ चतुर्दशी का महत्व

शास्त्रों के अनुसार वैकुंठ चतुर्दशी के दिन शरीर का त्याग करने वाले व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इस पूरे विधि-विधान से भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा करता है। उसके जीवन के सभी पाप कट जाते हैं।

पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवान शिव ने भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र प्रदान किया था। इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु एकाकार रूप में रहते हैं।

विद्वानों के मतानुसार जो व्यक्ति इस दिन भगवान विष्णु की 1000 कमलों से पूजा करता है। उसे और उसके परिवार को वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।

महाभारत के युद्ध में भी भगवान श्री कृष्ण ने मृत व्यक्तियों का श्राद्ध वैकुंठ चतुर्दशी के दिन ही कराया था। इसलिए इस दिन श्राद्ध तर्पण करने को भी विशेष महत्व दिया जाता है।

वैकुंठ लोक को केवल सद्गुणी, दिव्य पुरुष या सतकमों को करने वाला व्यक्ति ही प्राप्त कर सकता है। लेकिन वैकुंठ चतुर्दशी का व्रत रखने से यह वैकुंठ धाम की प्राप्ति आसानी से की जा सकती है।

वैकुंठ धाम के सर्वसखों का धाम माना जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में वैकुंठ चतुर्दशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।

वैकुंठ चतुर्दशी की कथा

एक बार भगवान् विष्णु देवों के देव महादेव का पूजन करने के लिए काशी पधारे। काशी में मणिकर्णिका घाट पर स्नान करके उन्होंने 1000 स्वर्ण कमल पुष्पों से भगवान् विश्वनाथ के पूजन का संकल्प लिया।

अभिषेक के बाद जब वे पूजन करने लगे तो शिव जी ने उनकी भक्ति की परीक्षा के उद्देश्य से एक कमल पुष्प कम कर दिया। भगवान् श्रीहरि को अपने संकल्प की पूर्ति के लिए 1000 कमल पुष्प चढ़ाने थे।

भगवान विष्णु की शिव भक्ति

एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा कि उनकी आंखें कमल के ही समान हैं, इसलिए उनको 'कमलनयन' और 'पुण्डरीकाक्ष' कहा जाता है। एक कमल के स्थान पर वह अपनी आँख ही चढ़ा देते हैं। यह सोचकर वे अपनी आंखें चढ़ाने को आगे बढ़े।

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भगवान श्रीहरि विष्णु की इस भक्ति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव प्रकट हुए और बोले -हे विष्णु! तुम्हारे समान संसार में दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है, आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब वैकुण्ठ चतुर्दशी के नाम से जानी जाएगी।

इस दिन व्रतपूर्वक पहले आपका पूजन कर जो मेरा पूजन करेगा, उसे वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होगी।

भगवान शिव ने विष्णु को सुदर्शन चक्र प्रदान करते हुए कहा कि यह राक्षसों का अंत करने वाला होगा। तीनों लोकों में इसके समान कोई अस्त्र नहीं होगा।

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