हैदराबाद : मुसलमानों के प्रमुख पर्वों में एक है 'बारावफात', जिसे 'ईद ए मिलाद' और 'मिलाद-उन-नबी' के नाम से भी जाना जाता है। इस साल 10 नवंबर को 'मिलाद-उन-नबी मनाया जाएगा। इसको लेकर शहरों और गावों भी तैयारियां शुरु हो गई है। मस्जिदों को सजाने लग गए हैं। कहते हैं कि शांति, सच्चाई एवं धर्म का संदेश देनेवाले पैंगबर मुहम्मद ( Prophet Muhammad ) का जन्म इसी दिन हुआ था। दुर्भाग्यवश इसी दिन उनका इंतकाल भी हुआ था।

‘बारावफात’ में ‘बारा’ का आशय 12 और ‘वफात’ का अर्थ इंतकाल से है। यानी पैगंबर मोहम्मद 12 दिन की बीमारी के बाद चल बसे थे। इस दिन को शिया समाज जन्मदिन के रूप में मनाते हैं, जबकि सुन्नी समाज पैगंबर की मृत्यु के कारण गमी के साथ उन्हें याद करता है। मान्यता है कि इस दिन मुहम्मद पैगंबर की शिक्षा को सुना जाये, तो इंसान मौत के पश्चात स्वर्ग को जाता है।

इस दिन को लेकर लोगों में मतभेद भी हैं। बक़ौल रसूलल्लाह सोग मनाने से अच्छा होता है खुशी मनाना। उन्होंने खुद जुमा को ईद कहा है। हालांकि पैगंबर साहब ने एक सादगी भरा जीवन बिताया है।

क्या है मिलाद

ऐसे में मिलाद-उन-नबी के दिन जश्न के तौर पर हुड़दंग,तमाशा या शौर-शराबा करना गलत बताया गया है। पर पैगंबर के जन्मदिन के जश्न पर घर सजाना, या उनकी ज़िंदगी के बारे में पढ़ना और सुनाना बेहतरीन कदम है। इस्लाम कैलेंडर के अनुसार पैगंबर हजरत मोहम्मद का जन्म रबि-उल-अव्वल माह के 12वें दिन 570 ई. को मक्का में हुई था। वह इस्लाम के आखिरी पैगंबर माने जाते हैं। कुरान में ईद-ए-मिलाद को मौलिद मावलिद के नाम से जाना जाता है। मिलाद का मतलब पैगंबर की यौमे पैदाइश के दिन को कहा गया है। इसलिए ईद मिलाद-उन-नबी को पैगंबर की याद में सभाएं की जाती हैं और उनकी शिक्षाओं और विचारों का प्रसार किया जाता है।

पैगंबर की याद में जश्न मनाए या शोक

दुनिया भर के मुसलमान हज़रत मोहम्मद के जन्म को तो पवित्र मानते हैं लेकिन इसे मनाने के अलग-अलग रूप हैं। सुन्नी और शिया मुसलमानों के बीच हज़रत मोहम्मद के जन्मदिन को मनाने को लेकर मतभेद हैं। इस दिन को सिर्फ शिया समुदाय के लोग ही हर्षोउल्लास से मनाते हैं। वहीं सुन्नी समुदाय इसे शांति से मनाने पर जोर देता है। एक ओर शिया समुदाय पैगंबर हजरत मुहम्मद के जन्म की खुशी में जश्न मानाता है। तो वहीं दूसरी ओर सुन्नी समुदाय इसे पैगंबर की मृत्यु के दिन के तौर पर देखता है। जिसका मतलब ईद मिलाद पैगंबर की विसाल और वफात का दोनों का दिन है। इस कारण सुन्नी समुदाय पूरे माह शोक मनाते हैं। हालांकि सुन्नियों में भी बरेलवी समुदाय इस दिन जश्न मनाता है।

सुन्नी संदेश मानते हैं और शोक मनाते हैं

सुन्नी समुदाय इसी दिन मोहम्मद साहब की मृत्य होने के कारण इसे शोक के रूप में मनाते हैं। रात्रि भर चलने वाले मोहम्मद पैगंबर की शिक्षा वे बड़ी शिद्दत से सुनते हैं, उन्हें याद करते हैं। इसके बाद मस्जिदों में जाते हैं, और मोहम्मद साहब की शिक्षा का जीवन भर अनुसरण करने का प्रण लेते हैं, ताकि मोहम्मद पैगंबर के सपनों को साकार किया जा सके।

शिया इसे पैगंबर के जन्मदिन के रूप में मनाते हैं

शिया समुदाय इस पर्व को मोहम्मद पैगंबर के जन्म दिन के रूप में मनाते हैं, इसलिए इस दिन वे पूरे जोश और उत्साह के साथ इसे सेलीब्रेट करते हैं। उनका मत यही होता है कि इसी दिन पैगंबर मोहम्मद ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में हजरत अली का चुनाव किया था। कहने का आशय शिया समुदाय के लिए यह दिन एक नये नेता के चुनाव की खुशी में मनाया जाता है। इसके साथ ही वे पैगंबर मुहम्मद का जन्म दिन भी सेलीब्रेट करते हैं। यानी उनके लिए यह दिन दोहरी खुशियों वाला होता है।

ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद इमाम ख़ुमैनी ने ये कहा था कि हज़रत मोहम्मद के जन्मदिन को दुनिया भर में उनके संदेश को पहुंचाने के रूप में मनाया जाना चाहिए। सऊदी अरब में इसे ईद के रूप में नहीं मनाया जाता है, लेकिन तुर्की और कई दूसरे इस्लामी देशों में हज़रत मोहम्मद के जन्मदिन को बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है।

देवंदी और बरेलवी मुसलमान

भारत की बात करें तो यहां के सुन्नी मुसलमान दो ख़ास हिस्सों में बंटे हुए हैं। एक हिस्सा ख़ुद को बरेलवी मुसलमान कहता है जबकि दूसरा हिस्सा ख़ुद को देवबंदी मुसलमान कहता है। बरेलवी मुसलमान हज़रत मोहम्मद के जन्म को बहुत धूम-धाम से मनाते हैं।

इस दिन बरेलवी मुसलमान ख़ास आयोजन करते हैं। कई जगहों पर ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं जिनमें इस्लाम और हज़रत मोहम्मद के जीवन के बारे में लोगों को बताया जाता है। हज़रत मोहम्मद की शान में जुलूस निकाले जाते हैं। एक से एक बढ़िया पकवान बनते हैं। ग़रीबों और यतीमों को खाना खिलाया जाता है। लेकिन देवबंदी मुसलमान इस अवसर पर कोई ख़ास आयोजन नहीं करते हैं। उनका कहना है कि इस्लाम में जन्मदिन मनाने की कोई प्रथा नहीं है।

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1989 में वीपी सिंह की नेशनल फ़्रंट सरकार ने हज़रत मोहम्मद के जन्मदिवस को सरकारी छुट्टी घोषित कर दिया जिसके बाद इसके बारे में ज़्यादा चर्चा होने लगी और मुसलमानों का एक हिस्सा भी इसे बढ़-चढ़ कर मनाने लगा।

पैगंबर मुहम्मद ने दिया था विश्व को शानदार तोहफा

पैगंबर मोहम्मद ने दुनिया को इस्लाम के रूप में एक शानदार तोहफा दिया था। क्योंकि इससे पूर्व अरब समाज में किस्म-किस्म की बुराइयां व्याप्त थीं। लोग अपनी बेटियों को जिंदा जला देते थे। जरा सी बात पर म्यान से तलवारें निकलना और किसी को भी मौत की नींद सुला देना आम था। पैगंबर मोहम्मद ने इस्लाम के द्वारा लोगों को जीने का नया तरीका सिखाया। इस्लाम के उदय होने के बाद अरब के बर्बर कबीलों में ना सिर्फ सभ्यता का उदय हुआ बल्कि भाई-चारे का भी विकास हुआ और यह सब संभव सिर्फ इस्लाम और कुरान के संदेश के कारण हो पाया।