नई दिल्ली : पंडित भीमसेन जोशी किराना घराने के सबसे प्रसिद्ध गायकों में से एक माने जाते थे। उन्हें उनकी ख़्याल शैली और भजन गायन के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। पंडित भीमसेन जोशी ने कई फ़िल्मों के लिए भी गाने गाए। उन्होंने ‘तानसेन’, ‘सुर संगम’, ‘बसंत बहार’ और ‘अनकही’ जैसी कई फ़िल्मों के लिए गायिकी की। उन्होंने अपने एकल गायन से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में नए युग का सूत्रपात किया। पंडित जोशी सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्‍न' से सम्मानित किया गया था।

भारतीय संगीत के क्षेत्र में इससे पहले एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी, उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान, पंडित रविशंकर और लता मंगेशकर को भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी योग्यता का आधार उनकी महान संगीत साधना है। देश-विदेश में लोकप्रिय हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान गायकों में उनकी गिनती होती थी।

भीमसेन जोशी
भीमसेन जोशी

कौन थे पंडित भीमसेन जोशी

पंडित भीमसेन जोशी का जन्म कर्नाटक के गड़ग गांव में 4 फरवरी, 1922 ई. में हुआ। उनके पिता गुरुराज जोशी हाई स्कूल के हेडमास्टर थे। भीमसेन के पिता जी गुरूराज जोशी कन्नड़, अंग्रेज़ी और संस्कृत के विद्वान थे। वहीं उनके के दादा एक प्रसिद्ध कीर्तनकार थे। उन्होंने 19 साल की उम्र से गायन शुरू किया था।

19 साल की उम्र पंडित भीमसेन जोशी ने गायिकी शुरू की। ( फाइल फोटो
19 साल की उम्र पंडित भीमसेन जोशी ने गायिकी शुरू की। ( फाइल फोटो

बचपन से ही थी संगीत का शौक

पंडित भीमसेन जोशी को बचपन से ही संगीत का बहुत शौक था। वह किराना घराने के अब्दुल करीम खान से बहुत प्रभावित थे। 1932 में वह गुरु की तलाश में घर से निकल पड़े। इसके बाद लगातार दो सालों तक वह बीजापुर, पुणे और ग्वालियर में रहे। उन्होंने ग्वालियर के उस्ताद हाफिज अली खान से भी संगीत की शिक्षा ली, लेकिन अब्दुल करीम खान के शिष्य पंडित रामभाऊ कुंडालकर से उन्होने शास्त्रीय संगीत की शुरूआती शिक्षा ली।

ठुमरी और भजन में हासिल की महारत

घर वापसी से पहले वह कलकत्ता और पंजाब भी गए। वर्ष 1936 में पंडित भीमसेन जोशी ने जाने-माने खयाल गायक थे। वहाँ उन्होंने सवाई गंधर्व से कई वर्षो तक खयाल गायकी की बारीकियाँ भी सीखीं। उन्हें खयाल गायन के साथ-साथ ठुमरी और भजन में भी महारत हासिल की है।

20 साल की उम्र में निकला पहला एल्बम

साल 1941 में भीमसेन जोशी ने 19 वर्ष की उम्र में मंच पर अपनी पहली प्रस्तुति दी। इसके बाद उनका पहला एल्बम 20 की उम्र में निकला, जिसमें कन्नड़ और हिन्दी में कुछ धार्मिक गीत थे। ठीक इसके दो साल बाद वह रेडियो कलाकार के तौर पर मुंबई में काम करने लगे। कई घरानों के गुणों को मिलाकर भीमसेन जोशी अद्भुत गायन प्रस्तुत करते थे। अभोगी, पूरिया, दरबारी, मालकौंस, तोड़ी, ललित, यमन, भीमपलासी, शुद्ध कल्याण आदि पंडितजी के पसंदीदा राग थे। इसके अलावा अभंग में माझे माहेर पंढरी, पंढरी चा वास और भजन में जो भजे हरी को सदा ठुमरी पिया के मिलन की आस आदि काफी प्रसिद्ध है।

भीमसेन की पहली पत्नी गंगूबाई हंगल (सबसे बाएं) बीच में वत्सलाबाई जोशी जो उनकी दूसरी पत्नी थी।  (फाइल फोटो)
भीमसेन की पहली पत्नी गंगूबाई हंगल (सबसे बाएं) बीच में वत्सलाबाई जोशी जो उनकी दूसरी पत्नी थी।  (फाइल फोटो)

पंडित जी ने की दो शादियां

भीमसेन ने दो शादियाँ की। उनकी पहली पत्नी सुनंदा कट्टी थी जिनसे उन्होंने 1944 में शादी की। सुनंदा से उन्हें चार बच्चे हुए, राघवेन्द्र, उषा, सुमंगला और आनंद। 1951 में उन्होंने कन्नड़ नाटक भाग्य-श्री में उनकी सह-कलाकारा वत्सला मुधोलकर से शादी कर ली। उस समय बॉम्बे प्रान्त में हिन्दुओ में दूसरी शादी करना क़ानूनी तौर पे अमान्य था इसीलिए वे नागपुर रहने के लिए चले गए, जहाँ दूसरी शादी करना मान्य था।

उन्होंने अपनी पहली पत्नी को ना ही उन्होंने तलाक दिया था और ना ही वे अलग हुए थे। वत्सला से भी उन्हें तीन बच्चे हुए, जयंत, शुभदा और श्रीनिवास जोशी। समय के साथ-साथ कुछ समय बाद उनकी दोनों पत्नियाँ एक साथ रहने लगी और दोनों परिवार भी एक हो गए, लेकिन जब उन्हें लगा की यह ठीक नही है तो उनकी पहली पत्नी अलग हो गयी और लिमएवाडी, सदाशिव पेठ, पुणे में किराये के मकान में रहने लगी

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जब पंडित भीमसेन पीने लगे शराब

पंडित भीमसेन जोशी को शराब पीने की भी आदत थी। तनावपूर्ण पारिवारिक माहौल के चलते उससे उबरने के ख़ातिर वह शराब का सहारा लेने लगे थे जो धीरे-धीरे आदत बन गई। इस बात की जानकारी गजेंद्र नारायण सिंह द्वारा लिखी गई एक किताब से मिली है। इस किताब का नाम है ‘कालजयी सुर’ जो कि वाणी प्रकाशन से छपी है।

लता जी के साथ पंडित भीमसेन जोशी
लता जी के साथ पंडित भीमसेन जोशी

आधी रात लता जी को करते थे फोन

पंडित भीमसेन के बारे में देश के प्रख्यात महिला गायिका लता मंगेशकर ने स्वयं अपना अनुभव सुनाते हुए कहा था कि, ‘कभी-कभी देर रात में उनके फोन की घंटी बजती तो वे सोचती थी कि इतनी रात को कौन शहनाई बजा रहा है? फोन उठाते ही - उधर से मेरे बाबा (पिता दीनानाथ मंगेशकर) के नाट्यगीतों का गान सुनाई देता है, ‘सुरा मी बन्दिले’, आवाज पहचानने की जरूरत नहीं- ऐसी आवाज एक ही है- देर रात तक भीमसेन मेरे बाबा का संगीत सुनाते रहते और मैं ‘वाह-वाह’ करती रहती।’