समाज चाहे कितना भी आगे बढ़ जाए, आधुनिकता से लैस हो जाए पर आज भी कुछ बातें समाज में इस तरह रची-बसी दिखाई देती है जो सहज ही पुरातन काल की याद दिला देती है। जी हां, यहां बात समाज में महिलाओं की स्थिति पर हो रही है।

महिलाओं को आज भी जीती-जागती इंसान से ज्यादा अपनी संपत्ति के तौर पर देखा जाता है जिसकी अपनी कोई इच्छा-अनिच्छा नहीं होती। घर की महिलाओं पर सब कुछ जैसे थोपा जाता है, यहां तक कि इच्छाएं भी।

उसे वह सब करना होता है जो उसे करने के लिए कहा जाता है, जैसे ही वह अपनी बात कहती है या किसी बात का विरोध करती है वैसे ही उसको वह सब कुछ सहना पड़ता है जो उसने कभी सोचा भी नहीं होता, जिसे घरेलू हिंसा कहा जाता है।

घर में उसे सब कुछ करना होता है बस वह अपनी मर्जी न चलाए। मर्जी चलाना तो दूर उसका अपनी बात कहने भर से जैसे घर में भूचाल आ जाता है, पुरुषों को बुरा लग जाता है कि वह अब अपनी बात कह रही है जबकि उसे तो सब कुछ स्वीकार्य होना चाहिए।

घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज उठाएं 
घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज उठाएं 

ऐसे पुरुष अपनी बात रखने के लिए पुरातन काल की कहावतों का भी जमकर इस्तेमाल करते हैं, जहां स्त्री को दबाकर रखने की बात कही गई है। हम देखते हैं कि लड़कियों को शुरू से ही घर में सिखाया जाता है कि वह सहने की आदत डाल ले क्योंकि उसे दूसरे घर जाना है, वहां सब कुछ सहना है, विरोध करने की आदत सही नहीं है।

जो लड़कियां विरोध करती है उन्हें घर पर ही डांट पड़ती है। ऐसी सीख लेकर जब लड़की ब्याही जाती है तो वह ससुराल में भी सब कुछ सहने की आदत डाल लेती है, इसी बात का फायदा सब उठाते हैं और वह सिर्फ सॉफ्ट टारगेट बन कर रह जाती है।

महिला के सहने से कुछ कम नहीं होता बल्कि उसके साथ ज्यादतियां बढ़ती ही जाती है। सरकार चाहे घरेलू हिंसा को रोकने के कितने ही कदम उठा ले पर जब तक महिलाएं स्वयं इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगी तब तक कुछ नहीं हो सकता।

अक्सर हम देखते हैं कि महिलाओं के शरीर पर जहां-तहां चोट के निशान दिखते हैं। जिन्हें देखकर साफतौर पर कहा जा सकता है कि वे शारीरिक चोट के निशान है पर वे बहाना बनाकर उसे छिपा लेती है। उनकी यही आदत उनके खिलाफ जाती है और किसी दिन कुछ बड़ा हो जाता है। इस सबसे तंग आकर कई महिलाएं तो मौत को गले भी लगा लेती है।

महिलाओं को सबसे पहले तो यह जान लेना चाहिए कि वे कहीं से, किसी भी तरह से कमजोर नहीं है, तो जब भी उनके साथ कुछ गलत हो तो वे इसके खिलाफ आवाज उठाए, जो भी उनके साथ गलत कर रहा है उसकी शिकायत करे, उसे सबक सिखाए तभी बात बनेगी।

चुप रहना और सहते जाना या फिर आत्महत्या करना, गलत है। महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए कई तरह के कानून बन चुके हैं पर ये उनकी मदद तभी कर सकते हैं जब वे खुद अपनी मदद करे, इसके खिलाफ शिकायत करे।

महिलाओं के शिकायत करने से ही कानून उनके साथ खड़ा हो सकता है। अक्सर महिलाएं यह सोचकर कि प्रताड़ित करने वाला उनका पति है, रिश्तेदार है, सब कुछ सहती है पर उनका ऐसा करना उस शख्स को प्रोत्साहित करता है, इसलिए सबसे पहले उस पर लगाम कसना जरूरी है। वरना वह यूं ही करता जाएगा और सहना किसी चीज का इलाज नहीं है।

अक्सर घरों में पति अपनी पत्नियों के साथ मारपीट करते हैं और पत्नी भी यह सोचकर सहती है कि मारने वाला उसका अपना पति ही है। यहीं वह गलत करती है, उसे यह जानना चाहिए कि उसे इस तरह मारने का हक उसके पति को भी नहीं है।

जब महिलाएं इस बात को गंभीरता से लेगी तभी समाज बदलेगा, अत्याचार के प्रति उनकी मूक सहमति ही घरेलू हिंसा के मामलों को बढ़ा रही है। महिलाओं द्वारा सही जाने वाली शारीरिक यातनाएं आयु के साथ कम नहीं होती बल्कि बढ़ती हैं।17% घरेलू हिंसा की घटना 15-19 साल की लड़िकयों के साथ, तो 35% घरेलू हिंसा की घटना 40-49 साल की महिलाओं के साथ होती है।

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घरेलू हिंसा के मामलों को कम करने के लिए महिलाओं को खुद अपनी लड़ाई लड़नी होगी। इसके साथ ही अगर पुरुष उसे अपने पैर की जूती ना समझे और उसके साथ अपने साथी की तरह बर्ताव करे तो ऐसे मामलों में कमी आ सकती है।

अक्सर लड़कियों को सीख दी जाती है कि बुरे के साथ बुरा नहीं बना जाता पर आज लड़कियों व महिलाओं को इस बात पर गौर करना चाहिए कि अन्याय करने वाले से ज़्यादा अन्याय सहने वाला गुनाहगार होता है।

तो जब महिलाएं सहना छोड़ देंगी और अपने प्रति अन्याय करने वालों को, प्रताड़ित करने वालों के खिलाफ शिकायत करेंगी, उन्हें सजा दिलवाएंगी तो अन्य लोग भी समझेंगे और इस तरह कुछ हद तक इस समस्या का हल भी निकलेगा।

घरेलू हिंसा को सहना ठीक नहीं 
घरेलू हिंसा को सहना ठीक नहीं 

महिलाओं को सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि वे कमजोर नहीं है और अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने में भी सक्षम है। साथ ही यह भी कि घरेलू हिंसा को वे बिलकुल नहीं सहेंगी और अगर घरेलू हिंसा हुई तो शिकायत दर्ज कराने में देर नहीं करेंगी।

अगर महिलाएं इस तरह सशक्त होकर अपनी लड़ाई स्वयं लड़ेंगी तभी अन्य लोग भी उनकी मदद कर सकेंगे और फिर समाज में बदलाव आएगा। तब तक कोई कुछ नहीं कर सकता।

सरकार भी कानून बना सकती है पर जब उसके पास शिकायत दर्ज होगी तभी तो कोई कार्रवाई हो सकती है। इसलिए सबसे पहले महिलाओं को जागरूक होना पड़ेगा। अपने अधिकारों के बारे में जानना होगा तभी बात बनेगी।