समाज चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण, महिलाओं के प्रति हिंसा तो जैसे आम बात है क्योंकि यह हिंसा उसके साथ दूसरे नहीं बल्कि उसके अपने ही करते हैं। हद तो तब हो जाती है जब महिलाओं को पता भी नहीं होता कि उनके साथ कहीं कुछ गलत हो भी रहा है।

वह इसे अपने अपनों का हक समझकर सह जाती है और यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता, बल्कि बढ़ता जाता है। गृहिणियां अक्सर सब कुछ सहती जाती है और उनकी यह सहने की आदत ही जैसे उनकी दुश्मन बन जाती है।

कभी कोई गृहणी आवाज उठाती भी है तो उसकी आवाज को घर में बंद कर दिया जाता है यह कहकर कि खानदान की बदनामी होगी, इसलिए चुप रहो। यानी गलत भी महिला के साथ ही हो और खानदान के नाम की चिंता भी वही करे, जैसेकि सारा दारोमदार उस पर ही है और उस पर अत्याचार करने वाले यूं ही उसे दबाते रहेंगे।

चलिये यह सब तो हम भी अक्सर अपने आस-पास के घरों में देखते हैं कि महिलाओं का सहना ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। इसलिए तो जानकार कहते हैं कि पहली आवाज तो महिला को ही उठानी होगी, तभी कोई उसका साथ दे सकता है।

तो यहां सबसे पहले महिला को ये जानना होगा कि उसका हक क्या है, कैसे कोई उसके साथ वह सब नहीं कर सकता जो वह न चाहे। उसकी अपनी राय भी मायने रखती है क्योंकि वह भी सबसे पहले एक इंसान है जिसका अपना मान-सम्मान है।

अक्सर देखा जाता है कि महिलाओं को पता ही नहीं होता कि घरेलू हिंसा क्या है, कितने प्रकार की है, कैसे वह इसके खिलाफ आवाज उठा सकती है और कहां वह इसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है।

महिलाओं को यह पता हो जाए और अपने अधिकारों के प्रति वे जागरूक हो जाए तो समाज में बदलाव होने से कोई नहीं रोक सकता। पर सबसे पहले महिलाओं का जागरूक होना जरूरी है। हम देखते हैं कि घरेलू हिंसा के जो भी मामले दर्ज होते हैं वे सिर्फ और सिर्फ मार-पीट के ही होते हैं।

ज्यादातर लोग सिर्फ मार-पीट को ही घरेलू हिंसा समझते हैं जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है।सबसे पहले तो महिलाओं को यह जानना चाहिए कि घरेलू हिंसा चार प्रकार की होती है जिसमें से एक मारना-पीटना भी होता है। पर महिलाओं के न जानने का फायदा ही सब उठाते हैं।

घरेलू हिंसा को लेकर कई गलतफहमियां समाज में व्याप्त हैं जैसे शादी के बाद की मारपीट को ही कई लोग घरेलू हिंसा समझते हैं जबकि अगर लड़की को पढ़ने से रोका जाए, उसकी मर्जी के खिलाफ शादी तय कर दी जाए, उसके पहनावे पर रोक-टोक लगाई जाए तो वह भी घरेलू हिंसा के अंतर्गत ही आता है पर लोग-बाग इसके बारे में नहीं जानते।

घरेलू हिंसा पर बात करते हुए जानकार बताते हैं कि अगर कोई पति अपनी पत्नी की मर्जी के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाता है तो वह भी घरेलू हिंसा के अंतर्गत आता है।

वहीं अधिकतर महिलाएं इसका चाहकर भी विरोध नहीं कर पाती क्योंकि उनका मानना होता है कि यह पति का हक है और उनका चाहना न चाहना कोई मायने नहीं रखता। बस यहीं से वे पति की ज्यादतियों के आगे झुक जाती है और पति मनमानी करने लगते हैं।

महिलाओं को यह बात अच्छे से समझ लेनी चाहिए कि अत्याचार करने वाले से अत्याचार सहने वाला गलत है क्योंकि विरोध न करने से यह सब बढ़ता ही जाता है और इसकी जिम्मेदार सिर्फ वही होती है।

महिलाएं अगर घरेलू हिंसा सहती जाती है तो पति के साथ-साथ अन्य रिश्तेदार भी उस पर हावी होने लगते हैं। वहीं अगर हम आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा में पति और रिश्तेदार ही लिप्त होते हैं।

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इसीलिए घरेलू हिंसा का मुद्दा ऐसा है जो महिलाओं को सहने पर मजबूर कर देता है और वे अपने अपनों के खिलाफ कुछ भी कहने में समर्थ न होकर सब कुछ सहती जाती है।

अक्सर देखा जाता है कि महिलाओं को पता नहीं होता कि घरेलू हिंसा चार प्रकार की होती है जो इस प्रकार है -

शारीरिक हिंसा-किसी महिला को शारीरिक पीड़ा देना जैसे मारपीट करना, धकेलना, ठोकर मारना, लात-घूसा मारना, किसी वस्तु से मारना या किसी अन्य तरीके से महिला को शारीरिक पीड़ा देना शारीरिक हिंसा के अंतर्गत आता है।

सिर्फ मारपीट ही घरेलू हिंसा नहीं है 
सिर्फ मारपीट ही घरेलू हिंसा नहीं है 

यौनिक या लैंगिक हिंसा - महिला को अश्लील साहित्य या अश्लील तस्वीरों को देखने के लिए विवश करना, बलात्कार करना, दुर्व्यवहार करना, अपमानित करना, महिला की पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करना इसके अंतर्गत आता है।

मौखिक और भावनात्मक हिंसा -किसी महिला या लड़की को किसी भी वजह से उसे अपमानित करना, उसके चरित्र पर दोषारोपण लगाना, शादी मर्जी के खिलाफ करना, आत्महत्या की धमकी देना, मौखिक दुर्व्यवहार करना।

आर्थिक हिंसा - बच्चों की पढ़ाई, खाना, कपड़ा आदि के लिए धन न उपलब्ध कराना, रोजगार चलाने से रोकना, महिला द्वारा कमाए जा रहे धन का हिसाब उसकी मर्जी के खिलाफ लेना।

इसके अलावा भी घरेलू हिंसा होती है जिसमें खाना न देना, किसी से मिलने न देना, मायके वालों को ताना मारना, दहेज की मांग करना, चेहरे को लेकर ताना मारना, शक करना, घरेलू खर्चे उपलब्ध न कराना जैसे तमाम मामले शामिल हैं।

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महिलाओं को जानना चाहिए कि ये सभी हिंसाएं घरेलू हिंसा क़ानून 2005 के अंतर्गत आती हैं इसके तहत महिला जिले में तैनात सुरक्षा अधिकारी के पास आईपीसी की धारा 498ए के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकती है।

वहीं महिलाओं को यह भी जानना चाहिए कि डीआईआर को घरेलू घटना रिपोर्ट (डोमेस्टिक इंसीडेंट रिपोर्ट) कहते हैं जिसमें घरेलू हिंसा सम्बन्धी प्रारंभिक जानकारी दर्ज कराई जाती है।

हर जिले में सुरक्षा अधिकारी सरकार द्वारा नियुक्त होता है। सुरक्षा अधिकारी ही घरेलू हिंसा रिपोर्ट दर्ज करता है। राज्य सरकार द्वारा हर राज्य के जिलों में स्वयंसेवी संस्था की नियुक्त होती है जो सुरक्षा अधिकारी के पास रिपोर्ट दर्ज कराने में मदद करती है।

यह सब महिलाओं की मदद तब करते हैं जब स्वयं महिला खुद पर हो रही ज्यादती के खिलाफ आवाज उठाती है। तो महिलाओं को सहने की आदत छोड़कर अपने स्वाभिमान के लिए लड़ना चाहिए तभी समाज में बदलाव संभव हो सकता है।