नई दिल्ली : पिछड़े, दलितों और आदिवासियों को राजनीति में एक अहम स्थान दिलाने वाले कांशीराम डॉ. भीमराव आंबेडकर के बाद दलितों के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं। बुधवार को उनकी 13वीं पुण्यतिथि है। 8 नवंबर 2006 को उनका निधन हुआ था। कांशीराम से जुड़ी ऐसी कई बातें हैं जो उनके स्वभाव को दर्शाती है, लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति बनने का ऑफर भी ठुकरा दिया था, यह बात बेहद कम लोग ही जानते हैं।

यह उस वक्त की बात है, जब देश में एनडीए की सरकार थी। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी ने कांशीराम से राष्ट्रपति पद संभालने की बात कही थी। हालांकि कांशीराम ने वाजपेयी के इस ऑफर को ठुकरा दिया था।



बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती (फाइल फोटो)
बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती (फाइल फोटो)

कांशीराम की जीवनी कांशीराम, द लीडर ऑफ द दलित्स लिखने वाले बद्रीनारायण इस बात का जिक्र करते हुए कहते हैं कि उस वक्त उत्तर प्रदेश में भाजपा और बसपा की मिलीजुली सरकार चल रही थी। अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिक समीकरण को देखते हुए चाहते थे कि कांशीराम राष्ट्रपति का पद संभालें।

वाजपेयी ने जब कांशीराम के सामने यह बात रखी तो उन्होंने साफ मना कर दिया। दरअसल इसके पीछे की वजह बताई जाती है कि कांशीराम राष्ट्रपति नहीं प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, क्योंकि वह यह बात अच्छे से जानते थे कि प्रधानमंत्री पद की एक अलग गरिमा और ताकत है। इसलिए कांशीराम ने राष्ट्रपति से जैसे देश के सर्वोच्च पद को ठुकरा दिया था।

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कांशीराम का जीवन परिचय

कांशीराम का जन्म पंजाब के एक दलित परिवार में हुआ था। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर दलितों के उत्थान का फैसला किया था। 1981 में उन्होंने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति या डीएस4 की स्थापना की। 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की।