जानिए कैसा है भारतीय शास्त्रीय संगीत, ऐसे बढ़ता गया कारवां 

डिजाइन फोटो  - Sakshi Samachar

हैदराबाद : भारतीय शास्त्रीय संगीत भारतीय संगीत का अटूट अंग है। शास्त्रीय संगीत जिसे हम ‘क्लासिकल म्यूजिक के नाम से भी जानते हैं। भारत में संगीत की शुरुआत लगभग तीन हजार साल पहले रचे गए वेदों के संगीत का मूल स्त्रोत माना गया है। ऐसा मानना है कि ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को संगीत वरदान में दिया था। चारों वेदों में, सामवेद के मंत्रों का उच्चारण उस समय के वैदिक सप्तक या समगान के अनुसार सातों स्वरों के प्रयोग के साथ किया जाता था।

कॉन्सेप्ट फोटो

भारतीय शास्‍त्रीय संगीत की दो शैलियां हैं। इसमें से पहला है उत्तर भारतीय जिसे हिंदुस्तानी संगीत कहा जाता है जबकि दूसरा है दक्षिण भारतीय संगीत जिसे कर्नाटक संगीत के नाम से जाना जाता है। भार नियमों में बंधा हुआ शास्त्र-सम्मत संगीत ही शास्त्रीय संगीत कहलाता है। इनमें नियमों का कठोरता से पालन ज़रूरी होता है। ऐसा मानना है कि भारतीय संगीत की विराट नदी शताब्दियों तक अपनी मंथर गति से बहती रही और मध्यकाल में मुसलमानों के भारत आगमन के बाद यह दो धाराओं में बंट गई।

उत्तर भारतीय संगीत ( हिंदुस्तानी संगीत)

उत्तर भारतीय संगीत में काफ़ी बदलाव आए। संगीत अब मंदिरों तक सीमित न रह कर शासको के दरबार की शोभा बन चुका था। इसी समय कुछ नई शैलियॉं भी प्रचलन में आईं जैसे ख़याल, ग़जल आदि और भारतीय संगीत का कई नए वाद्यों से भी परिचय हुआ जैसे सरोद, सितार इत्यादि।

बाद में सूफ़ी आंदोलन ने भी भारतीय संगीत पर अपना प्रभाव जमाया। आगे चलकर देश के कई हिस्सों में कई नई पद्धतियों औक घरानों का जन्म हुआ। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान कई नए वाद्य प्रचलन में आए। आम जनता में भी प्रसिद्ध आज का वाद्य हारमोनियम, उसी समय प्रचलन में आया। इस तरह भारतीय संगीत के उत्थान व उसमें परिवर्तन लाने में हर युग का अपना महत्वपूर्ण योगदान रहा।

डिजाइन फोटो

कर्नाटक संगीत

जहां हिन्दुस्तानी संगीत मुगल बादशाहों की छत्रछाया में विकसित होता चला गया, वहीं कर्नाटक संगीत दक्षिण के मन्दिरों में प्रचलित हुआ। इसी कारण दक्षिण भारतीय कृतियों में भक्ति रस अधिक मिलता है और हिन्दुस्तानी संगीत में शृंगार रस।

इसे भी पढ़ें

खय्याम के सुनहरे संगीत ने इन गानों को बना दिया अमर, आप भी सुनें

गिरिजा देवी : ठुमरी की रानी, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का सितारा

दक्षिण की धारा ने बहुत कुछ अपने मूल स्वरूप को बचाए रखा, लेकिन उत्तर की धारा में मुसलमानों के साथ आया अरबी, ईरानी और मध्य एशिया का संगीत घुलता-मिलता गया। इस वजह से ध्रुपद के स्थान पर ख़याल, ठुमरी, टप्पा, तराना आदि सांगीतिक रूपों का जन्म हुआ और अंत में उनका वर्चस्व स्थापित हो गया।

कर्नाटक संगीत में कोई भी राग कभी भी गाया-बजाया जा सकता है लेकिन हिंदुस्तानी संगीत में रागों के गाने-बजाने के समय निर्धारित हैं। पूरे दिन को तीन-तीन घंटों के आठ प्रहर में बांट कर तय कर दिया गया है कि कौन-सा राग कब गाया-बजाया जाएगा और इसका सांगीतिक तर्क भी है।

Advertisement
Back to Top