नवरात्रि 2019 : प्रतिपदा पर होती है मां शैलपुत्री की पूजा, ये है कथा आरती व मंत्र 

माता शैलपुत्री की कथा का महत्व  - Sakshi Samachar

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री की पूजा होती है। माता शैलपुत्री की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाती है ताकि मां प्रसन्न होकर हमें मनचाहा वरदान दे सके।

माता शैलपुत्री की पूजा का बड़ा महत्व है और यह भी माना जाता है कि माता के इस रूप की पूजा करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है। मान्यता है कि शैलपुत्री की पूजा से चंद्र दोष से मुक्ति मिलती है।

माता शैलपुत्री की कथा भी इस अवसर पर पूजा व आरती के बाद पढ़ी व सुनी जाती है। आइये यहां जानते हैं माता शैलपुत्री की पौराणिक कथा ताकि हमारा भी जीवन बन जाए ...

ये है मां शैलपुत्री की कथा ...

कथा के अनुसार एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ किया। जिसमें उसने सारे देवी-देवताओं को आमंत्रित किया था लेकिन उसने भगवान शिव को उस यज्ञ के लिए निमंत्रण नहीं भेजा था।

जब माता सती को पता चला की उनके पिता ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया है तब उनका मन वहां जाने का हुआ। माता सती ने अपनी यह इच्छा भगवान शिव को जाकर बताई।

तब भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि पता नहीं क्यों लेकिन प्रजापति दक्ष हमसे रुष्ट है इसलिए उन्होंने अपने यज्ञ में सभी देवताओं को निमंत्रित किया है लेकिन मुझे इसका आमंत्रण नहीं भेजा और न ही कोई सूचना भेजी है।

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इसलिए तुम्हारा वहां जाना ठीक नहीं है लेकिन माता सती ने भगवान शिव की बात नहीं मानी। माता सती की अपने माता-पिता और बहनों से मिलने की बहुत इच्छा थी।

उनकी जिद्द के आगे भगवान शिव की एक न चली और उन्हें माता सती को उनके पिता के यज्ञ में जाने की अनुमति देनी ही पड़ी। माता सती खुशी-खुशी पिता के घर पहुंची।

वहां जाकर उन्होंने देखा कि सब उन्हें देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं और कोई भी उनसे ठीक प्रकार से बात नहीं कर रहा है। सिर्फ उनकी माता ने ही उन्हें प्रेम से गले लगाया था।

उनकी बहनों की बातों में व्यंग्य था और वह उनका उपहास कर रही थीं। अपने परिवार के लोगों का यह बर्ताव देखकर माता सती को अघात लगा। उन्होंने देखा कि सभी के मन में भगवान शिव के प्रति द्वेष की भावना है।

राजा दक्ष ने भगवान शिव का तिरस्कार किया और उनके प्रति अपशब्द भी कहे। यह सुनकर माता सती को अत्यधिक क्रोध आ गया। माता सती को लगा कि उन्होंने भगवान शिव की बात न मानकर बहुत बड़ी गलती कर दी है।

वह भगवान शिव का अपमान सहन नहीं कर सकी और उन्होंने अग्नि में अपने शरीर का त्याग कर दिया। जब भगवान शिव को इस बारे में पता चला तो उन्हें अत्यधिक क्रोध आ गया।

उन्होंने अपने गणों को भेजकर उस यज्ञ को पूरी तरह से खंडित करा दिया। इसके बाद माता सती ने अपना दूसरा जन्म शैलराज हिमालय के यहां पर लिया।

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शैलराज के यहां जन्म लेने के कारण वह 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुईं। उपनिषद् के अनुसार इन्हीं ने हैमवती के रूप में देवताओं का गर्व-भंजन किया था।

इन मंत्रों के जाप से प्रसन्न होंगी मां शैलपुत्री ...

- ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:

- ऊँ शं शैलपुत्री देव्यै: नम:

- वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

- वन्दे वांछित लाभाय चन्द्राद्र्वकृतशेखराम्।

वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्॥

- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

पूजा के बाद करें माता शैलपुत्री की आरती ...

शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।

शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।

पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।

ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।

सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।

उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।

घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।

श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।

जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।

मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।से

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