हम सब जानते हैं कि पितृपक्ष चल रहा है जो भाद्रपद की पूर्णिमा एवं अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक का समय होता है। इस बार पितृपक्ष 28 सितंबर तक चलेगा।

पितृपक्ष में पितरों के निमित्त श्राद्ध किया जाता है। जिस तिथि को किसी पूर्वज का देहांत होता है उसी तिथि को उनका श्राद्ध किया जाता है। पितृपक्ष में भोजन कैसा हो इसका भी बड़ा महत्व होता है।

ऐसे होने चाहिए श्राद्ध के पकवान ....

हम सबके लिए यह जानना जरूरी है कि श्राद्ध का भोजन अतिरिक्त शुद्धि चाहता है। इसमें किसी तरह की गलती होने पर पितर श्राद्ध स्वीकार नहीं करते।

- श्राद्ध में खीर पूरी अनिवार्य है।

- जौ, मटर और सरसों का उपयोग श्रेष्ठ है।

- ज़्य़ादा पकवान पितरों की पसंद के होने चाहिए।

- गंगाजल, दूध, शहद, कुश और तिल सबसे ज्यादा ज़रूरी है।

- तिल ज़्यादा होने से उसका फल अक्षय होता है।

पितृपक्ष में ऐसा हो भोजन 
पितृपक्ष में ऐसा हो भोजन 

- तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं।

श्राद्ध के भोजन में क्या न पकाएं

- चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा

- कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी,प्याज और लहसन

- बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, खराब अन्न, फल और मेवे

ऐसा होना चाहिए ब्राह्मणों का आसन

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- रेशमी, ऊनी, लकड़ी, कुश जैसे आसन पर भी बैठाएं।

- लोहे के आसन पर ब्राह्मणों को कभी न बैठाएं।

भोजन में खीर-पूरी व पनीर, सीताफल, अदरक व मूली का लच्छा तैयार किया जाता है। उड़द की दाल के बड़े बनाकर दही में डाले जाते हैं। पंडित सर्वप्रथम गाय का नैवेद्य निकलवाते हैं। इसके अलावा कौओं व चिड़िया, कुत्ते के लिए भी ग्रास निकालते हैं।

पितृ अमावस्या को आखिरी श्राद्ध करके पितृ विसर्जन किया जाता है तथा पितरों को विदा किया जाता है।

ब्राह्मण को भोजन कराने का महत्व

पुरुष के श्राद्ध में ब्राह्मण पुरुष को तथा स्त्री के श्राद्ध में ब्राह्मण महिला को भोजन कराया जाता है। लोग अपनी श्रद्धा अनुसार खीर-पूरी तथा सब्जियाँ बनाकर उन्हें भोजन कराते हैं तथा बाद में वस्त्र व दक्षिणा देकर व पान खिलाकर विदा करते हैं।

ऐसे किया जाता है पितरों का श्राद्ध

सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर अपने पूर्वज का चित्र रखकर पंडित नियमपूर्वक पूजा व संकल्प कराते हैं। इस दिन बिना प्याज व लहसुन का भोजन तैयार किया जाता है। बाद में पंडित व पंडिताइन के श्रद्धापूर्वक पैर छूकर उन्हें भोजन कराते हैं।

मान्यता है कि ब्राह्मणों को खीर-पूरी खिलाने से पितृ तृप्त होते हैं। यही वजह है कि इस दिन खीर-पूरी ही बनाई जाती है।

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श्राद्ध के भोजन में खीर बनाकर हम अपने पितरों के प्रति आदर-सत्कार प्रदर्शित करते हैं।

श्राद्ध में खीर बनाने के पीछे एक वजह ये है कि चावल को धर्म ग्रंथों में हविष्य अन्न कहा गया है यानी देवताओं का अन्न, जिसे अग्नि को अर्पित करने पर देवताओं सहित पितर भी तृप्त होते हैं।

वहीं पितृलोक चंद्रमा के उर्ध्वभाग पर माना गया है। खीर में उपयोग होने वाले दूध पर चंद्रमा का प्रभाव होता है। इस धार्मिक और ज्योतिषी कारणों से श्राद्ध में खीर बनाई जाती है।

इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण ये है कि श्राद्ध पक्ष से पहले का समय बारिश का होता है। पहले के समय में लोग बारिश के कारण अधिकांश समय घरों में ही व्रत-उपवास करके बिताते थे। व्रत-उपवास के कारण शरीर कमजोर हो जाता था। इसलिए श्राद्ध पक्ष के 16 दिनों तक खीर-पूड़ी खाकर खुद को पुष्ट करते थे।