हैदराबाद : हुस्न और इश्क़ का जिक्र आते ही जिगर मुरादाबादी का नाम बेसाख्ता जबान पर आ जाता है। मोहब्बत में महरूमी और मायूसी का सामना करने वाले जिगर की शायरी में ये एहसास शिद्दत से बयां होतें हैं। जिगर मुरादाबादी को ‘क्लासिकी' गजल के आखिरी शायर माने जाते हैं।

जिगर मुरादाबादी, वो शायर थे, जिन्होंने बेपनाह मुहब्बत की, मगर जब उनका दिल टूट, तो उन्होंने शराब को अपना सहारा बना लिय। वो शराब में इस कदर डूब गए कि उनकी शायरी में मैकशी, मैकदे और मैकश की ही ख़ुशबू आने लगी। जिगर पीते जरूर थे, मगर वो थे बहुत नेक और सलीकेमंद इंसान थे। अक्सर वो लोगों की मदद करके भूल जाया करते थे।

उर्दू शायरी में उनका नाम इसलिए भी लोकप्रिय है क्योंकि जिगर मुरादाबादी के लिए कहा जाता है कि जिस मुशायरे में वो बैठते थे, फिर उस मुशायरे में दूसरा शायर टिक नहीं पाता था। आज ही के दिन उर्दू अदब का यह खिदमतगार जिस्मानी तौर पर भले ही हमसे दूर हो गया हो लेकिन अपनी जदीद शायरी से वो आज भी हमारे बीच है। 6 अप्रैल 1890 को जन्मे जिगर साहब की वतन परस्ती का ही यह आलम था कि पाकिस्तान का सर्वोच्च खिताब पाकर भी वहां बसने की पेशकश ठुकरा दी। जिगर साहब ने कहा कि जियूंगा भी यहीं और मरूंगा भी यहीं। 9 सितंबर 1960 को जिगर साहब ने गोंडा में आखिरी सांस ली। जहां पर आज भी उनकी मजार है।

जिगर मुरादाबादी की शख्सियत ही कामयाबी की ज़मानत थी। अपनी इस शायरी के मुताबिक खाक नशीनी के नजारे उन्होने तमाम लोगों को दिखा दिए। इसकी तस्दीक करता है, उनकी जिंदगी से जुड़ा एक वाकया। जिगर साहब जिंदगी के आखिरी वक्त में बीमारी से परेशान थे। इलाज के लिए उन्हें पैसों की जरूरत थी। खुद्दार इतने थे, कि उन्हें कोई पैसा दे पाने की हिम्मत न जुटा पा रहा था। प्रशंसकों ने सोचा कि उनकी किताब आतिश-ए-गुल पर उनके दस्तख्त करा लिए जाएं। इससे किताब की अच्छी कीमत मिल जाएगी और वही पैसा जिगर साहब के इलाज में काम आ जाएगा। इस बात का पता लगने पर वह भड़क गए। लाख मिन्नतें करने के बाद भी उन्होंने दस्तख्त न किए।

हमेशा सफेद चूड़ीदार पायजामा, वास्कट कमीज, शेरवानी और पान की सजधज में रहने वाले जिगर ने वाकई जिंदगी भर फूल- कांटे सबसे निबाह किया। इस मौके पर आज हम आपके लिए ही उनके कुछ चुनिंदा शेर लेकर आएं हैं।

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं।

हम ने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका

मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया।

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है

सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है।

उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें

मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे।

इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा

आदमी काम का नहीं होता।

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।

आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं

जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं।

आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना है

जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है ।

दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं

कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं ।

इतने हिजाबों पर तो ये आलम है हुस्न का

क्या हाल हो जो देख लें पर्दा उठा के हम।