आखिर क्यों राष्ट्रपिता बन न सके अच्छे पिता, बड़े बेटे हरिलाल क्यों करते थे बापू से नफरत  

महात्मा गांधी व हरिलाल  - Sakshi Samachar

अक्सर देखा जाता है कि जो व्यक्ति देश-दुनिया के लिए सोचता है, करता है उसका अपने घर पर, घरवालों पर ध्यान कम होता है। इसीको कहते हैं चिराग तले अंधेरा। ठीक इसी तरह महात्मा गांधी राष्ट्रपिता तो बन गए पर अच्छे पिता नहीं बन पाए।

उनकी अपनी ही संतान उनके खिलाफ थी और कई बार तो उनके विरुद्ध विद्रोह भी किया था। हम बात कर रहे हैं गांधीजी के बड़े बेटे हरिलाल की। जिनकी बापू से कभी नहीं बनी। वे अपनी मां यानी बा से तो बेहद प्यार करते थे पर गांधीजी से नफरत ही करते रहे।

वहीं हम यह भी जानते हैं कि कोई भी बात यूं ही नहीं होती, हर बात का कारण होता है तो हरिलाल के भी अपने कारण थे गांधीजी से नफरत करने के, वे अपने कारणों पर अड़े रहे और दोनों के बीच के रिश्ते कभी सुधर नहीं पाए। गांधीजी भी हरिलाल को हमेशा अपना नालायक बेटा ही मानते थे।

यूं तो महात्मा गांधी के चार बेटे थे। दो बेटे भारत में पैदा हुए और दो दक्षिण अफ्रीका में। चारों बेटे अलग-अलग मिजाज के थे लेकिन हरिलाल को छोड़कर कोई उस तरह उनके खिलाफ नहीं गया। हालांकि हरिलाल का जीवन भी काफी कष्टपूर्ण रहा।

कस्तूर बा अपने चारों पुत्रों के साथ 

हरिलाल का जन्म 1888 में तभी हो गया था जबकि गांधीजी पढाई के लिए इंग्लैंड गए थे। वो भी पिता की तरह बैरिस्टर बनना चाहते थे। लंदन में जाकर शिक्षा हासिल करना चाहते थे।

लेकिन खुद विदेश में पढ़े-लिखे गांधी जी इसके घॊर विरॊधी थे। उनका कहना था कि विदेशी शिक्षण से बच्चों की धार्मिक आस्था खतरे में आ जायेगी। इसके चलते उन्होंने अपने बच्चों को दक्षिण अफ्रीका में स्कूली शिक्षा तक के लिए नहीं भेजा।

यहां आश्चर्य कि बात यह है कि खुद विदेश में पढ़कर भी जिसकी धार्मिक आस्था में बदलाव नहीं आया वह अपने बॆटे की धार्मिक आस्था के बारे मॆं आश्वस्त नहीं थे! इस विषय में खूब तनातनी के बाद अंत में बेटे के ऊपर पिता की ही जीत हुई।

यहीं से हरिलाल के मन में पिता के प्रति नफरत ने पैठ जमा ली और वे हर बात पर उनका विरोध करने लगे।

हरिलाल अपने भाइयों में सबसे पतले, लंबे और सुंदर थे। 1910 में दक्षिण अफ्रीका में जब गांधी परिवार स्थायी रूप से टालस्टाय फार्म में आ गया, तब हरि 23 साल के थे और मणिलाल 18 साल के थे। हरिलाल और मणिलाल दोनों ही अपनी सुचारु स्कूली शिक्षा नहीं होने से खासे क्षुब्ध रहते थे।

हरिलाल शुरू में दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के साथ आंदोलनों में हिस्सा भी लेते थे। कई बार वहां जेल भी गए लेकिन बाद में गांधीजी से उनके लगातार तर्क वितर्क होने लगे। वह ये महसूस करने लगे कि पिता की निरंकुशता को वो और बर्दाश्त नहीं कर सकते।

हरिलाल व कस्तूर बा 

बाद में वो पिता को छोड़कर भारत लौट आए। अहमदाबाद में उन्होंने स्कूल में पढाई की कोशिश की लेकिन ऐसा कर नहीं पाए। लेकिन धीरे-धीरे पिता से बेसाख्ता घृणा करने लगे। परिवार से खासतौर से पिता से सारे संबंध भी टूट गए।

हरिलाल इतने विद्रोही हो गए कि उन्होंने पिता को ठेस पहुंचाने के लिए 1936 में मुस्लिम धर्म स्वीकार लिया और वे अब्दुल्ला गांधी हो गए। हालांकि अपनी मां के अनुरोध पर दोबारा हिंदू धर्म स्वीकार कर लिया।

जब गांधीजी का अंतिम संस्कार हुआ तो हरिलाल भी वहां पहुंचे लेकिन वो इतनी फटेहाल थे कि कोई उनको पहचान भी नहीं पाया।

हरीलाल अपने आखिरी समय में बहुत ही बुरी हालत में थे वे अपने पिता के अंतिम संस्कार में नशे में चूर होकर पहुंचे थे। अपनी जिंदगी के आखिरी समय तक वे नशे में ही रहे। अंततः उनकी मृत्यु 18 जून 1948 को मुंबई में हो गई।

गांधीजी के दूसरे बेटे मणिलाल थे। मणिलाल से भी गांधीजी की कोई खास नहीं बनती थी लेकिन वो उस तरह कभी विद्रोही नहीं हुए, जिस तरह हरिलाल। जब गांधीजी 1915 में हमेशा के लिए भारत आ गए तो मणि भी उनके साथ यहां आए।

हालात कुछ ऐसे बने कि उन्हें महसूस होने लगा कि वो पिता के साथ रह नहीं पाएंगे। उन्हें अपनी स्वतंत्रता चाहिए थी। वो दो साल बाद ही वापस दक्षिण अफ्रीका चले गए।

वहां उन्होंने डरबन में गांधीजी के फिनिक्स आश्रम को संभालने के साथ वहां के प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक समाचार पत्र इंडियन ओपिनियन का संपादन शुरू किया। 1956 में अपने निधन तक वो यही करते रहे। उन्होंने पिता से दूर दक्षिण अफ्रीका में ही बसने का फैसला कर लिया।

गांधी के सबसे प्रिय बेटे नंबर तीन रामदास थे। जिन्हें गांधीजी ने अपने निधन पर मुखाग्नि का अधिकार दिया। रामदास आमतौर पर चुप रहने वाले खुशमिजाज बेटे थे। पिता के आज्ञापालक। कई बार जेल गए। भारत के स्वाधीनता संग्राम में भी कूदे। बाद में वो परिवार के साथ पुणे में बस गए।

चौथे नंबर के देवदास सही मायनों में सबसे पैने और बुद्धिमान बेटे थे। वो पिता से अपनी बात मनवा लेते थे। लिखने पढने में उनका कोई जवाब नहीं था।

उन्हें जानने वाले लोग उन्हें उम्दा पत्रकार मानते थे। वो हिंदुस्तान टाइम्स में लंबे समय तक संपादक रहे। गांधीजी हमेशा अपने बेटों को शादी के लिए हतोत्साहित करते थे लेकिन देवदास अकेले ऐसे बेटे थे, जिनके विवाह पर गांधीजी ने कोई बखेडा़ खड़ा नहीं किया बल्कि वो खुशी-खुशी मान गए।

देवदास 28 साल के थे और वो सी राजगोपालाचारी की बेटी लक्ष्मी से प्यार करते थे लेकिन लक्ष्मी केवल 15 साल की थीं। जब उन्होंने पिता से अपनी पसंद का जिक्र किया तो पिता ने केवल इतनी शर्त लगाई कि अगर ये शादी तुम पांच साल बाद करो तो मेरी सहमति रहेगी। उन्होंने ऐसा ही किया।

हरिलाल का व्यक्तित्व

हर व्यक्ति का अपना एक अलग व्यक्तित्व होता है पर जब किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व को दबा दिया जाए या कुचल दिया जाए तो विद्रोह फूट पड़ता है। ऐसा ही हरिलाल के साथ हुआ था।

कहा जाता है कि गांधीजी केवल दो व्यक्तियों से हारे हैं- एक मुहम्मद अली जिन्ना और दूसरा उनका पुत्र हरिलाल।

हरिलाल का कहना था कि जब-जब उन्होंने महात्मा गांधी की शिक्षा का विरोध किया तब-तब उसे तुच्छ करार देकर उनके विचारों को दबाने का प्रयास किया गया।

हरिलाल के स्वतंत्र व्यक्तित्व को गांधीजी लगातार नकारते जा रहे थे। हरिलाल के मन का विस्फोट गांधी विरोध के रूप में हुआ होगा। यह विस्फोट धीरे-धीरे विकृत होता चला गया। हरिलाल ने पिता के खिलाफ बगावत कर दी।

गांधीजी का पुत्र होने के कारण छोटे काम मिलते नहीं थे और औपचारिक शिक्षा के अभाव में बड़ा काम किया नहीं जा सकता था। विफलता की फिसड्डी राह पर हरिलाल के जीवन की यात्रा शुरू हुई।

महात्मा गांधी की देश और अपने जीवन के बारे में कुछ निश्चित और दृढ़ भूमिका थी। हरिलाल की पक्की भावना थी कि इसी भूमिका के कारण उन पर अन्याय हो रहा है। यह महात्मा गांधी और हरिलाल के बीच वैचारिक संघर्ष था।

पिता-पुत्र के इस संघर्ष में आगे गांधीजी ने हरिलाल का पूरी तरह त्याग कर दिया। इसके बाद उसे कोई अपने दरवाजे पर भी खड़ा नहीं करता था। क्योंकि, गांधीजी की नाराजी कोई नहीं लेना चाहता था। हरिलाल का जीवन मात्र अपमान और वेदना का जीवन बन गया था।

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हरिलाल की पत्नी का असामयिक निधन हो गया। इसके बाद हरिलाल के जीवन में पारिवारिक संगत और स्नेह कहीं नहीं बचा। असंतोष की लपटों, और उससे होने वाले विचित्र बर्तावों, बुरी आदतों और लगातार प्रताड़ना से हरिलाल मानसिक और शारीरिक रूप से थकते जा रहे थे।

इसी सबके चलते उनका जीवन तो स्वाहा हो ही गया था उनकी मौत भी गुमनाम रूप से ही हुई। हरिलाल अपनी पहचान बनाने के लिए पिता से लड़ते-झगड़ते ही मौत की गोद में सो गए।

वहीं महात्मा गांधी न हरिलाल पर कभी अपने विचार थोप सके और न ही कभी उनसे जीत सके और न ही कभी उन्होंने हरिलाल को समझने की कोशिश ही की।

इस तरह देखा जाए तो राष्ट्रपिता अपनी ही संतान के अच्छे पिता नहीं बन पाए, हरिलाल से वे दुखी रहे और उनसे हरिलाल भी दुखी ही रहे। बीच में पिसती रही कस्तूर बा। पत्नी और मां के द्वंद्व को वे अपने में समेटे यूं ही तिल-तिल कर मरती रही।

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