कैंसर से लड़ रहे जेटली अब नहीं रहे, ऐसी थी उनकी शख्सियत, करते थे गजब की शेर-ओ-शायरी 

अरुण जेटली (फाइल फोटो)  - Sakshi Samachar

नई दिल्ली : कुछ लोग परिचय के मोहताज नहीं होते। अरुण जेटली भी एक ऐसा ही नाम है जो राजनीति के एक चमकदार सितारे के रूप में उभर कर सामने आया। जेटली भाजपा के प्रमुख नेता एवं प्रसिद्ध अधिवक्ता के साथ-साथ पूर्व वित्त मंत्री भी रहे। इतना ही नहीं राजग के शासन में केंद्रीय न्याय मंत्री एवं इसके अलावा भी कई बड़े पदों पर आसीन रहे, लेकिन जेठली ने आज इस दुनिया के अलविदा कह दिया।

आपको बता दें कि पिछले कई दिनों से जेटली का नई दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में इलाज चल रहा था। वह नौ अगस्त से एम्स के आईसीयू में भर्ती हैं और उनकी हालत ‘‘गंभीर'' बनी हुई थी और डॉक्टरों की टीम उनके उपचार पर नजर रख रही थी. लेकिन आज इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

सीए बनने का था सपना

अरुण जेटली राजनीति से लेकर व्‍यक्‍त‍िगत जिदगी तक हर जगह बेहद गंभीर स्‍वभाव के माने जाते हैं। खास बात तो यह है कि उनका तंज कसने का तरीका भी थोड़ा अलग होता है। 28 दिसंबर साल 1952 को नई दिल्ली में जन्में अरुण जेटली बचपन से ही कुछ अलग करने का सपना था। वह सीए बनना चाहते थे। पढ़ने में काफी तेज अरुण जेटली ने दिल्ली के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से इकोनॉमिक्स में स्नातक की पढ़ाई की। इतना ही नहीं इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री भी ली है।

छात्र संघ के अध्यक्ष बने

अरुण जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे तभी से राजनीतिक सफर शुरू हो गया था। यह सबसे पहले छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे। वे अखिल भारती विद्यार्थी परिषद में दिल्ली ईकाई और अखिल भारतीय अध्यक्ष भी बने थे। देश में अपातकाल के समय इन्होंने एक खास भूमिका निभाई थी। इन्हें जेल भी जाना पड़ा था। तिहाड़ जेल में गुजरे उनके 19 महीने कई अध्यायों के लिए तीखा मसाला हैं।

नरेंद्र मोदी से दोस्ती

उनके जीवन के कई अन्य मोड़ भी हैं। जैसे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी काफी पहले हुई दोस्ती, जिसकी वजह से उन्हें भाजपा में ऊपर पहुंचने में मदद मिली। 2002 के दंगों के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में खुलकर राजनैतिक और कानूनी रूप से बचाव करने की वजह से जेटली उदारवादियों की लानत-मलानत के केंद्र बिंदु बन गए। लेकिन वे मोदी के साथ रहे और इसका फायदा दोनों को मिला।

चुनावी राजनीति बनाने में महारत

पिछले कुछ दशक में जेटली की देख-रेख में चुनावी राजनीति में कई अहम प्रयोग हुए। उन्होंने कर्नाटक में 2008 में भाजपा को जिताने में मदद की, जिससे दह्निण के भाजपा विरोधी किले को ढहाने में मदद मिली। उन्होंने मोदी की गुजरात में तीन बार चुनावी जीत में मदद की। उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी 2005 में गठबंधन के लिए मनाया था, जो आपातकाल के दिनों के उनके पुरानी साथी थे। उस समय ये लोग जयप्रकाश नारायण के अनुयायी थे।

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इस जानलेवा बीमारी से जूझ रहे अरुण जेटली, इसलिए लगातार गिर रही सेहत

सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी कहते हैं, “अरुण काफी तेज थे। अच्छे वक्ता थे। वे कभी आरएसएस के सक्रिय सदस्य नहीं रहे, लेकिन सच कहा जाए तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से उसकी कभी आलोचना भी नहीं की।”

दरबार लगाने का शौक

आलोचकों का कहना है कि जेटली को दरबार पसंद है। दिल्ली के लोधी गार्डन में मॉर्निग वॉक के दौरान इसका एक चलता-फिरता संस्करण होता है। वास्तव में सत्ता की मलाई चाहने वालों, लॉबिइंग करने वालों और सामान्य दोस्तों के लिए भी यह अच्छा मौका होता है। कोई भी यहां उनके साथ हो सकता है। कई लोग पहुंच भी जाते हैं। वे लोग भी जो कथित रूप से भाजपा नेता को भारत में लड़ाकू विमान बेचने की इच्छुक अपनी कंपनी की खासियत को बताने की कोशिश करते हैं।

बच्चे भी चले पिता की राह

अरुण जेटली बेहद गंभीर स्वभाव के व्यक्ति माने जाते हैं। अरुण जेटली ने 24 मई 1982 को संगीता जेटली से शादी की थी। संगीता जेटली स्वर्गीय गिरधारी लाल डोगरा की बेटी हैं। आज अरुण जेटली के एक बेटी सोनाली और एक बेटा रोहन हैं। इनके बच्चों ने भी अपने पिता की तरह ही वकालत के पेशे को अपनाया।

बजट में शायराना अंदाज

अरुण जेटली को शेरो शायरी का बेहद शौक है। उनका ये अंदाज बजट पेश करते समय देखने को मिला है। कई बार उन्होंने शायरियों के बल पर ही विपक्ष पर काफी अच्छे से तंज कसा है। अपनी इन शायरियों को लेकर अरुण जेटली काफी चर्चा में भी रह चुके हैं।

साल 2017 के बजट में जेटली ने पढ़ी ये शेर

इस मोड़ पर घबरा कर न थम जाइए आप,

जो बात नई है अपनाइए आप,

डरते हैं क्यों नई राह पर चलने से आप,

हम आगे आगे चलते हैं आइए आप।

साल 2016 में बजट पेश करते समय जेटली ने पढ़ी थी ये शायरी.

कश्ती चलाने वालों ने जब हार कर दी पतवार हमें,

लहर लहर तूफान मिलें और मौज-मौज मझधार हमें,

फिर भी दिखाया है हमने और फिर ये दिखा देंगे सबको,

इन हालातों में आता है दरिया करना पार हमें

2015 के बजट पेश के दौरान जेटली की शायरी

कुछ तो फूल खिलाये हमने

और कुछ फूल खिलाने हैं,

मुश्किल ये है बाग में

अब तक कांटें कई पुराने हैं।

उपरोक्त उप्लब्धियों को देखते हुए ये कहना मुश्किल न होगा की अरुण जेटली एक शशक्त शख्सियत के मलिक रहे हैं। बीते कुछ दिनों से उनको स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ़ों का सामना करना पड़ रहा था, यही कारण है की इस बार भाजपा की सरकार में उन्होंने अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर कोई पदभार गृहण न करने का फैसला किया था।

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