हम सब जानते ही हैं कि महात्मा गांधी यानी मोहनदास करमचंद गांधी ने अपनी पढ़ाई विदेश में पूरी की थी। उन्होंने इंग्लैंड में कानून के छात्र के रूप में 1888 में सूट पहना था। उसके बाद जब वे दक्षिण अफ्रिका में रहते थे तब भी सूट ही पहना करते थे।

तो यहां सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि वे सूट-बूट छोड़कर सिर्फ धोती पहनने लगे। क्या था वह कारण जिसने गांधीजी को सूट-बूट छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

आइये यहां जानते हैं ...

गांधीजी ने पहला सत्याग्रह चंपारण से शुरू किया। गांधी जी जब चंपारण पुहंचे तब वो कठियावाड़ी पोशाक पहने हुए थे। इसमें ऊपर एक शर्ट, नीचे एक धोती, एक घड़ी, एक सफेद गमछा, चमड़े का जूता और एक टोपी थी।

ये सब कपड़े या तो भारतीय मीलों में बने हुई थी या फिर हाथ से बुनी हुए थे।जब वे वहां पहुंचे तो उन्होंने वहां घोर गरीबी देखी। अंग्रेज जमकर किसानों का शोषण कर रहे थे।

महात्मा गांधी
महात्मा गांधी

उनसे नील की खेती करवाते थे। इसके बाद भी न उन्हें भरपेट भोजन मिलता था और न ही पहनने को सही तरीके से कपड़े व जूते।

जब गांधी जी ने सुना कि नील फैक्ट्रियों के मालिक निम्न जाति के औरतों और मर्दों को जूते नहीं पहनने देते हैं तो उन्होंने तुरंत जूते पहनने बंद कर दिए।

गांधीजी ने करीब से देखा और जाना कि वहां किसानों के साथ-साथ उनकी पत्नियों का भी शोषण होता था और उनके पास बदलकर पहनने के लिए जरूरी कपड़े भी नहीं थे। जब गांधीजी को यह बात कस्तूरबा से पता चली तो उन्होंने चोगा ओढ़ना बंद कर दिया था।

सत्य को लेकर गांधीजी के प्रयोग और उनके कपड़ों के ज़रिए इसकी अभिव्यक्ति ऐसे ही चली जब तक कि उन्होंने लंगोट या घुटनों तक लंबी धोती पहनना नहीं शुरू कर दिया।

महात्मा गांधी
महात्मा गांधी

इसके बाद जब गांधीजी 1918 में अहमदाबाद में करखाना मज़दूरों की लड़ाई में शरीक हुए तो उन्होंने देखा कि उनकी पगड़ी में जितने कपड़े लगते हैं, उसमें 'कम से कम चार लोगों का तन ढका जा सकता है।' उन्होंने उस वक्त पगड़ी पहनना छोड़ दिया था।

31 अगस्त 1920 को खेड़ा में किसानों के सत्याग्रह के दौरान गांधी जी ने खादी को लेकर प्रतिज्ञा ली ताकि किसानों को कपास की खेती के लिए मजबूर ना किया जा सके।

मैनचेस्टर के मिलों में कपास पहुंचाने के लिए किसानों को इसकी खेती के लिए मजबूर किया जाता था।तब गांधीजी ने प्रण लेते हुए कहा था,"आज के बाद से मैं ज़िंदगी भर हाथ से बनाए हुए खादी के कपड़ों का इस्तेमाल ही करूंगा। "

- गांधीजी जब 1921 में मद्रास से मदुरई जा रहे थे तो उन्होंने देखा कि रेल में हर कोई विदेशी कपड़े पहना था। जब गांधीजी ने उनसे खादी पहनने को कहा तो वे लोग बोले कि हम इतने गरीब है कि हम खादी नहीं खरीद सकते।

गांधीजी ने तर्क को महसूस किया और देखा कि उनके पास बनियान, टोपी और नीचे तक धोती थी। ये पहनावा अधूरी सच्चाई बयां करती थी जहां लाखों लोग निर्वस्त्र रहने के लिए मजबूर थे।

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चार इंच की लंगोट के लिए जद्दोजहद करने वाले लोगों की नंगी पिंडलियां कठोर सच्चाई बयां कर रही थी। तब गांधीजी ने कहा कि, ' मैं उन्हें क्या जवाब दे सकता था जब तक कि मैं ख़ुद उनकी पंक्ति में आकर नहीं खड़ा हो सकता हूं।

तो मदुरई में हुई सभा के बाद अगली सुबह से कपड़े छोड़कर मैंने ख़ुद को उनके साथ खड़ा किया।"इसके बाद गांधीजी ने घुटनों तक की धोती को ही अपना लिया। ऊपर एक खादी का गमछा और नीचे घुटनों तक कि धोती ही गांधीजी की पोशाक बन गई थी।

तो देखा आपने कि कैसे गांधीजी ने लोगों को सिर्फ भाषण नहीं दिया बल्कि उनकी तकलीफ महसूस करके उनकी पंक्ति में आकर खड़े हो गए और आखिरकार देश को आजाद करके ही मानें।

कभी अपने लिए कुछ नहीं चाहा तभी तो राष्ट्रपिता बने और देशवासियों के दिल में आज भी जीवित हैं।