कजरी तीज का पावन त्योहार रक्षाबंधन के तीन दिन बाद आता है। उत्तर भारतीय कैलेंडर के अनुसार, कजरी तीज भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। इस बार कजरी तीज 18 अगस्त 2019, रविवार को है।

खासतौर से यह त्योहार उत्तर भारत जैसे कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि में मनाया जाता है। राजस्थान में तो तीज माता का भव्य जुलूस भी निकलता है।

ये है कजरी तीज का महत्व

साल में चार तीज प्रमुख होती है। जैसेकि अखा तीज, हरियाली तीज, कजरी तीज व चौथी हरतालिका तीज। अन्य तीज व्रत की तरह ही कजरी तीज भी सुहाग की रक्षा और वैवाहिक जीवन में सुख, समृद्धि बनाए रखने के लिए की जाती है।

सुहागिनें जहां अपने पति की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित लड़कियां अच्छा वर प्राप्त करने के लिए यह व्रत करती हैं।

कजरी तीज के दिन महिलाएं श्रृंगार करती हैं, नए कपड़े पहनती हैं और हाथों में मेंहदी रचाती हैं। पूजा के दौरान वे माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करती हैं।

कजरी तीज की पूजा सामग्री 
कजरी तीज की पूजा सामग्री 

ऐसे की जाती है कजरी तीज की पूजा

कजरी तीज के अवसर पर नीमड़ी माता की पूजा की जाती है। पूजा के लिए मिट्टी से दीवार के सहारे या फिर किसी बड़ी सी थाली में मिट्टी की पाली बनाकर उसमें नीमड़ी की डाली रोपी जाती है। फिर एक तरफ पानी डालकर पानी तालाब जैसी आकृति बनाई जाती है।

यह काम सुबह या फिर दोपहर में ही कर लिया जाता है ताकि वह अच्छे से सूख सके।फिर शाम में महिलाएं सज-संवरकर पूजा करने बैठती हैं। सबसे पहले थाली में जो तालाब बनाया हुआ होता है उसमें कच्चा दूध और जल डालते हैं।

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किनारे पर एक दीया जलाकर रखते हैं। थाली में नींबू, ककड़ी, केला, सेब, सत्तू, रोली, मौली, अक्षत आदि रखकर पूजा की जाती है। नीमड़ी माता की पूजा के बाद इन सब चीजों की परछाई उस तालाब में देखी जाती है।

इसके बाद कजरी तीज की कहानियां सुनकर नीमड़ी माता की आरती की जाती है।

कजरी तीज की पूजा 
कजरी तीज की पूजा 

चंद्रमा को देते हैं अर्ध्य

कजरी तीज पर शाम के सामय पूजा के बाद चांद को अर्घ्य दिया जाता है। माना जाता है कि चंद्रमा को जल के छींटे देकर रोली, मोली, अक्षत चढ़ायें और भोग अर्पित करने से व्रत पूरा होता है।

चंद्रमा को अर्ध्य देने के बाद जो सत्तू थाली में बना होता है उसको चाकू से काटा जाता है जिसे पासना कहते हैं।

सत्तू पासने का काम पति करते हैं और फिर महिलाएं उस सत्तू के सात टुकड़े खाकर व्रत तोड़ती है। नीम की कंवली पत्तियां भी खाई जाती है। आंकड़े के पत्ते का दोना बनाकर उसमें सात बार कच्चा दूध पिया जाता है। तब कहीं जाकर ये व्रत पूरा होता है।