कजरी तीज के दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। वहीं इस तीज की तैयारी कुछ दिन पहले से ही शुरू हो जाती है जब घर में सत्तू बनाया जाता है। सत्तू इस पर्व की विशेष मिठाई है इसीलिए इसे सातुड़ी तीज भी कहा जाता है।

सातुड़ी तीज को कजली तीज और बड़ी तीज भी कहते है। सातुड़ी तीज की पूजा करते है। सातुड़ी तीज की कथा, नीमड़ी माता की कथा, गणेश जी की कथा और लपसी तपसी की रोचक कहानी सुनते हैं। इस बार यह पर्व 18 अगस्त 2019, रविवार को

ये है कजरी तीज की कथा-1

वैसे तो कजरी तीज से जुड़ी कई कहानियां है जो कही व सुनी जाती हैं। इन्हीं में से एक हम यहां जानते हैं।

एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। एक दिन ब्राह्मण की पत्नी ने कजरी तीज का व्रत रखा और पति से कहा कि मैंने आज कजरी माता का व्रत किया है। इसलिए आप मेरे लिए चने का सत्तू ले आएं लेकिन ब्राह्मण गरीब था और सोच रहा था कि बिना पैसों के सत्तू कहां से लाये।

कजरी तीज की पूजा 
कजरी तीज की पूजा 

ब्राह्मण एक साहुकार की दुकान पर पहुंचा। साहुकार गहरी नींद में सो रहा था। ब्राह्मण चुपचाप अंदर गया और सत्तू बनाकर लाने लगा। लेकिन जैसे ही ब्राह्मण दुकान से निकलने लगा साहुकार उठ गया और चिल्लाने लगा। इस पर ब्राह्मण ने कहा कि 'मैं चोर नहीं हूं मैं केवल सवा किलो सत्तू लेकर जा रहा हूं। क्योंकि आज मेरी पत्नी ने कजरी तीज का व्रत किया है और उसके लिए पूजा सामाग्री चाहिए।' इस पर ब्राह्मण की तालाशी ली गई और उसके पास से सचमुच कुछ नहीं मिला।

इससे साहुकार का मन भर आया और उसने ब्राह्मण की पत्नी को बहन बना लिया और ब्राह्मण को गहने पैसे व सामान देकर विदा किया। तभी से कजरी तीज पर बहन व बेटियों के घर सत्तू बनाकर भेजने की परंपरा शुरू हो गई जो आजतक चल रही है।

कजरी तीज की कथा 2-

दूसरी कथा के अनुसार एक साहूकार था और उसके सात बेटे थे। उसका सबसे छोटा बेटा अपाहिज़ था। वह रोजाना एक वेश्या के पास जाता था। उसकी पत्नी बहुत पतिव्रता थी। खुद उसे कंधे पर बैठा कर वेश्या के यहां ले जाती थी। बहुत गरीब थी। जेठानियों के पास काम करके अपना गुजारा करती थी।

कजरी तीज की विशेष मिठाई सत्तू 
कजरी तीज की विशेष मिठाई सत्तू 

भाद्रपद के महीने में कजली तीज के दिन सभी ने तीज माता के व्रत और पूजा के लिए सातु बनाए। छोटी बहु गरीब थी उसकी सास ने उसके लिए भी एक सातु का छोटा सा पिंडा बनाया। शाम को पूजा करके जैसे ही वो सत्तू पासने लगी उसका पति बोला मुझे वेश्या के यहां छोड़ कर आ।

हर दिन की तरह उस दिन भी वह पति को कंधे पैर बैठा कर छोड़ने गई, लेकिन वो बोलना भूल गया, ''तुम जाओ।

वह बाहर ही उसका इंतजार करने लगी इतने में जोर से वर्षा आने लगी और बरसाती नदी में पानी बहने लगा। कुछ देर बाद नदी से आवाज आई...आवतारी जावतारी दोना खोल के पी, पिया प्यारी होय... आवाज सुनकर उसने नदी की तरफ देखा तो दूध का दोना नदी में तैरता हुआ आता दिखाई दिया। उसने दोना उठाया और सात बार उसे पी कर दोने के चार टुकड़े किए और चारों दिशाओं में फेंक दिए।

उधर तीज माता की कृपा से वेश्या अपना सारा धन उसके पति को वापस देकर सदा के लिए वहां से चली गई। पति ने सारा धन लेकर घर आकर पत्नी को आवाज़ दी- दरवाज़ा खोल... तो उसकी पत्नी ने कहा मैं दरवाज़ा नहीं खोलूंगी। तब उसने कहा कि अब मैं वापस नहीं जाऊंगा। दोनों मिलकर सातु पासेंगे।

चंद्रमा की पूजा के लिए दीया जलाती महिलाएं 
चंद्रमा की पूजा के लिए दीया जलाती महिलाएं 

लेकिन उसकी पत्नी को विश्वास नहीं हुआ, उसने कहा- मुझे वचन दो वापस वेश्या के पास नहीं जाओगे। पति ने पत्नी को वचन दिया तो उसने दरवाज़ा खोला और देखा उसका पति गहनों और धन माल सहित खड़ा था। उसने सारे गहने-कपड़े अपनी पत्नी को दे दिए। फिर दोनों ने बैठकर सातु पासा।

सुबह जब जेठानी के यहां काम करने नहीं गई तो बच्चे बुलाने आए काकी चलो सारा काम पड़ा है। उसने कहा अब तो मुझ पर तीज माता की पूरी कृपा है, अब मैं काम करने नहीं आऊंगी। बच्चों ने जाकर मां को बताया, आज से काकी काम करने नहीं आएगी उन पर तीज माता की कृपा हुई है, वह नए-नए कपड़े गहने पहन कर बैठी हैं और काका जी भी घर पर बैठे हैं। सभी लोग बहुत खुश हुए।

हे तीज माता !!! जैसे आप उस पर प्रसन्न हुई वैसे ही सब पर प्रसन्न होना, सब के दुःख दूर करना।