‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा देने वाले मौलाना हसरत ने भी किया था अनुच्छेद 370 का विरोध  

मौलाना हसरत मोहानी - Sakshi Samachar

नई दिल्ली : मौलाना हसरत मोहानी किसी पहचान के मोहताज नहीं है। आज की रूमानी पीढ़ी इन्हें "चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है/हमको अब भी आशिकी का वो ज़माना याद है" नाम की मशहूर ग़ज़ल के रचयिता के तौर पर जानती है, पर हसरत मोहानी लाजवाब इंसान थे। आज़ादी की लड़ाई में जमकर हिस्सा लिया।

बालगंगाधर तिलक के नारे "स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है" को हसरत मोहानी जीवन भर जीते रहे। तिलक से उनका बड़ा आत्मीयता भरा नाता था। इंकलाब जिंदाबाद का नारा देने वाले भी हसरत मोहानी ही थे।

17 अक्टूबर 1949 को जब संविधान सभा के सामने अनुच्छेद 370 जोड़ने की बात आई तो हसरत ने सबसे पहले खड़े होकर विरोध किया, "ये भेदभाव वाला अनुच्छेद! ये कश्मीर को दूसरे प्रदेशों से अलग करने वाला अनुच्छेद! इसे आप संविधान में कैसे जोड़ सकते हैं?"

इस मुल्क में भिंडी-तरोई की पैदावार से लेकर कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने तक हर बात को हिन्दू-मुस्लिम के नज़रिए से देखने वालों को ये कभी नही भूलना चाहिए कि ये हसरत मोहानी का मुल्क है।

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उन्नाव जिले के मोहन क़स्बे में पैदा हुए थे हसरत

'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा देने वाले मौलाना हसरत मोहानी क नाम आज़ादी के दीवानों में बड़े फख्र और इज्ज़त से लिया जाता है। 1 जनवरी 1875 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के मोहन क़स्बे में पैदा हुए हसरत मोहानी का पूरा नाम सैयद फज़लुल हसन था। लेकिन बतौर शायर 'हसरत' उन्होंने अपना तखल्लुस रखा था और अपने पैदाइश के शहर 'मोहान' का नाम उसमें जोड़ लिया था। इस तरह वो 'हसरत मोहानी' हो गए थे।

बचपन से ही पढ़ाई में ख़ास दिलचस्पी रखने वाले हसरत ने शुरुआती तालिम तो घर पर ही हासिल की. लेकिन जब स्कूल गए तो उस ज़माने में राज्य स्तर की परीक्षा में टॉप किया था। आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी चले गए और कॉलेज के दौर से ही आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने लगे।

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